हमारी आजादी की लड़ाई बाकी है, स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र मनोवृत्ति और निर्भिक नागरिक बनें – बाबा साहब (3-5-2025)


10 जून, 1956 को दिल्ली के अम्बेडकर भवन के मैदान में एक सभा का आयोजन किया गया था। इसमें तीस हजार से भी अधिक जन समुदाय उपस्थित था। दिल्ली की भारतीय बौद्धजन समिति की शाखा की ओर से 2500वां बुद्ध महापरिनिर्वाण दिन, जयंति और संबोधी दिन मनाने के लिए इस सभा का आयोजन किया गया था। कंबोडिया के आदरणीय वीर धर्मवीर महाथेरा सभा के अध्यक्ष थे। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा,
बहनों और भाइयों,
ब्राह्मण धर्म अन्याय, निर्ममता, गरीबों के शोषण का जनक है। वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण सबसे ऊपर वाली पायदान पर हैं। उनके बाद क्षत्रीय, उनके बाद वैश्य और इन सबका बोझ अपने सिर पर लिए सबसे निचली पायदान पर शूद्र हैं। शूद्रों को अगर अपनी उन्नति करनी हो तो उसे ऊपरी तीन वर्णों के साथ संघर्ष करना पड़ेगा। इन तीनों वर्णों का जरा भी मन नहीं होता कि वे शूद्रों के कल्याण की चिंता करें। वैश्यों और क्षत्रियों से धर्म ने ब्राह्मणों को अधिक श्रेष्ठ बनाया है इसलिए वे ब्राह्मण वर्ग के धार्मिक गुलाम हैं। सीधे-सादे शब्दों में कहना हो तो शूद्रों की उन्नति की राह के रोड़े बने हुए ये तीन वर्ण उसके दुश्मन हैं।
जिस समाज में धार्मिक स्तर पर लोगों को नोचा-खसोटा जाता हो, वहां किसी प्रकार की उन्नति की आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं? इसी कारण शूद्रों को हमेशा पैरों तले दबाए रखा गया और जब- जब उन्होंने विरोध में लड़ने के लिए कमर कसी तब-तब उनके सिर को गर्दन से अलग किया गया।
इसके ठीक विपरीत बौद्ध धर्म की ओर देखें, इसमें जातिवाद और विषमता का कोई स्थान नहीं। सभी अधिकार समान- धर्म में सबको समान अधिकार। कोई उच्च नहीं कोई निम्न नहीं। खुद बुद्ध ने अन्याय के खिलाफ लड़ कर ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ धर्म की स्थापना की।
पहले आर्य (ब्राह्मण) पूजा करते समय हजारों पशुओं की बलि चढ़ाया करते थे ।
पशु हत्या का इतिहास (गाय और भैंसों का कत्ल ) अगर देखा जाए तो अंग्रेजों ने और मुसलमानों ने इस देश की जितनी गायें मार कर खाई होंगी उससे अधिक गायें उस युग के ब्राह्मणों ने खाई हैं।
पहले चार तरह के ब्राह्मण थे। समयांतर से उनकी सत्रह अलग उपजातियां बनीं। ब्राह्मण धर्मग्रंथों से पता चलता है कि गोमांस के हिस्से को लेकर, गायों-भैंसों की चमड़ी पर मालिकियत को लेकर हमेशा ब्राह्मणों में युद्ध हुआ करते थे। ब्राह्मणों के देवताओं को प्रसन्न रखने के लिए जो पशुहत्या नहीं करते थे उन्हें ब्राह्मण धर्मानुयायी नहीं माना जाता था। इसी कारण बौद्ध धर्म अस्तित्व में आया। बौद्ध धर्म ने मानव को सोचने की आजादी देकर पूरी तरह सोच कर योग्य मार्ग अपनाने की आजादी दी है। नैतिकता पर आधारित अहिंसा का उपदेश बौद्ध धर्म में दिया गया है। इस बारे में आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। लोगों ने अहिंसा का गलत अर्थ लगाया। इंसान को पशुहत्या नहीं करनी चाहिए या हाथ में तलवार लेकर देश की रक्षा के लिए लड़ना नहीं चाहिए यह अहिंसा नहीं है। अहिंसा दो बातों पर आधारित है। आवश्यकता के लिए हत्या और हत्या करने की इच्छा हुई इसलिए हत्या ! राष्ट्र पर अगर हमला हुआ, देश अगर संकटों से घिरा तो तलवार हाथों में लेकर, राष्ट्र की रक्षा के लिए हथेली पर सिर लेकर युद्ध क्षेत्र में कूद जाना और दुश्मनों का सफाया करना, उनकी हत्या करना हर नागरिक का कर्तव्य है। इसका मतलब है कि यह हिंसा आवश्यक थी। उसे बौद्ध दर्शन में उच्चतम स्तर की अहिंसा कहा जाता है। दूसरी, मारने की इच्छा मन में पैदा होना। यानी कि अपने संतोष के लिए पशुबलि देना, पशुहत्या करना इसे हिंसा कहा गया है।
बौद्ध दर्शन को जैसे का तैसा अपनाकर उसी में अपने जातिवाद आदि के तत्व घुसेड़कर हिंदू दार्शनिक उसे अपना दर्शन कहते हैं। ब्राह्मण धर्म के लेखक कहते हैं वेद प्रजापति ने दिए हैं। भगवान बुद्ध ने सवाल पूछा कि प्रजापति किस जगह से पैदा हुआ? हिंदुओं के वेद और गीता का अध्ययन करें तो ध्यान में आता है कि भगवतगीता और कुछ नहीं बल्कि ‘धम्मपद’ ही है। लेकिन ब्राह्मण धम्मपद की नकल करते हुए उसमें जातिव्यवस्था घुसेड़ना नहीं भूले। खुद श्रीकृष्ण ने अपने शिष्यों को उपदेश किया कि ब्राह्मणेतरों को कोई ज्ञान नहीं देना अथवा धर्मोपदेश नहीं देना ।
प्रार्थना करने से या किसी के पैर पकड़ने से वे तुम्हें कुछ नहीं देंगे। लड़ना हो तो अपनेअंदर पहलवानों-सी ताकत होनी चाहिए। पहलवान बहुत खाता है, उसे हजम भी करता है और उससे शक्ति प्राप्त करता है । उसी प्रकार आपकी मानसिक ताकत बढ़नी चाहिए। सत्य और सही मार्ग का आश्रय तो मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। डरपोक कभी भी लड़ नहीं सकते। अस्पृश्यता की गंदगी हटाने के लिए मैंने कई सालों से अथक मेहनत की है। लेकिन अभी तक मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुआ हूं। मेरा मन मजबूत है। इसलिए मैं आखिर तक लडूंगा। जुल्मों के खिलाफ लड़ने के लिए मानसिक बल और नैतिक साहस चाहिए। वह आपको प्राप्त हो इसके लिए मैं आपको नई राह बताता हूं। आप अगर बुद्ध मार्ग का अनुसरण करें तो दुनिया में आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी, इतना ही नहीं आपको बलप्राप्ति भी होगी और आपके बालबच्चों का भविष्य उज्ज्वल बनेगा। समानता और स्वाभिमान से जीने की राह दिखाने के लिए वे आपके प्रति कृतज्ञ रहेंगे।
मैंने सुना है कि लोग अन्याय के खिलाफ लड़ें नहीं, इसलिए उन्हें अपने दल में ले आने के लिए काँग्रेस उन्हें पैसा बांट रही है। सरकार मुझसे भी पैसा लेने के लिए कह रही थी। उद्देश्य उनका यह था कि मेरा मुंह बंद रहे। लेकिन आप जानते हैं कि मैंने कभी पैसा नहीं लिया। अपना पेट पालने के लिए मैं मेहनत करके पैसा कमाऊंगा। अस्पृश्यों के अधिकारों की और हित की रक्षा के लिए आखिर तक लड़ता रहूंगा । इसीलिए मैं आपसे विनती करता हूं कि ध्यान रहे कि भले कुछ भी क्यों न हो जाए कोई आपका स्वाभिमान न खरीद पाए कांग्रेस के पैसा देकर खरीदने के षडयंत्र को कुचल दो। समाज में गर्दन हमेशा ऊंची रहे इसलिए हमेशा खबरदार रहें। सब कुछ दांव पर लगा कर अपना और समाज का स्वाभिमान कायम रखें। मैं कोई दूत नहीं हूं। या ईश्वर का प्रतिनिधि भी नहीं हूं। मैं भगवान बुद्ध का विनम्र शिष्य हूं। मैं आपको यह मार्ग दिखा रहा हूं। यह मार्ग अगर आपको सही लगता हो तो आप उसका अनुसरण करें। लेकिन इस मार्ग को अपनाने से पहले उसके बारे में सभी पहलुओं पर सोचिए । भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायियों से कहा कि किसी भी बात का स्वीकार पूरी तरह से सोच समझ कर ही कीजिए । बिना सोचे-समझे किसी बात को ना स्वीकारें । प्रकृति में मानव स्वतंत्र है, इसीलिए मैं आपसे कहूंगा कि स्वतंत्र विचार – प्रणाली का स्वतंत्र रूप से निडर नागरिक बनें।

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