हर रविवार के दिन बुद्धविहार जाना हर बौद्ध धम्म अनुयायियों का पहला कर्तव्य है

दिनांक 24 नवंबर, 1956 को दोपहर 1 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर काशी से सारनाथ आए। वे वहां के भिक्षुओं से मिले। उनसे चर्चा करते समय बाबासाहेब ने मुख्यतः इस बात पर जोर दिया कि हर रविवार के दिन हर बौद्ध को नियमित रूप से बुद्ध विहार में जाकर उपदेश ग्रहण करना चाहिए । इसी प्रकार उन्होंने हर विभाग में बुद्ध विहार निर्माण कर उसमें सभा लेने के लिए काफी जगह वाला सभागृह होना जरुरी है यह बात भी जोर देकर कही। इस नजरिए से सिलोन, ब्रह्मदेश, तिब्बत, चीन आदि देशों के भिक्षुओं ने आगे बढ़ कर और पैसा इकट्ठा कर मदद करने की सलाह दी।

इस अवसर पर उपस्थित लोगों और भिक्खुओं को संबोधित करते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-

” जनता को अब गंभीरता से सोचना होगा। हिंदू धर्मग्रंथों में जिस जीवन का वर्णन किया है उसका और हमारे द्वारा तैयार किए गए संविधान में क्या कोई समानता है? अगर नहीं, तो उसके क्या कारण हो सकते हैं? अपना धर्म या संविधान इन दोनों में से किसी एक बात का हमें स्वीकार करना होगा। या तो धर्म को जिंदा रखना होगा या फिर संविधान को ही जगाना होगा। दोनों बातें एक ही जगह नहीं रह सकतीं, दोनों में कोई मेल नहीं हो सकता।

हिंदू धर्म में कई मत हैं। उसमें शंकराचार्य का मत सबसे अच्छा माना जाता है । शंकराचार्य का ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ का सिद्धांत सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन बौद्ध धम्म के उच्च सिद्धांतों के आगे वह बेहद तुच्छ और निरर्थक है। नए-नए बने बौद्धों का आद्य कर्तव्य है कि वे हर रविवार के दिन बौद्ध विहार में जाएं। वरना नए बौद्धों का धम्म से परिचय नहीं होगा। इसके लिए जगह-जगह बुद्ध विहार का निर्माण होना चाहिए। विहार में सभा लेने के लिए जगह होनी चाहिए। लंका, बर्मा, तिब्बत, चीन आदि देशों के बौद्ध भिक्षु आगे बढ़ कर पैसा इकट्ठा करें और भारत के बौद्ध लोगों की मदद करें।

 आज सुबह उत्तर प्रदेश के पूर्व सभापति आयु. द्वारकाप्रसाद मुझे मिले थे। उनका आग्रह था कि दिसंबर में मैं जौनपुर जाऊं। मैंने उन्हें जाने का आश्वासन दिया। लेकिन तारीख अभी तय नहीं हुई है। जौनपुर में विराट सामुदायिक धर्मांतरण कार्यक्रम की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के पूर्णिया जिले के लाखों पिछड़े लोग दीक्षा लेंगे। आज भी इन पिछड़ी जातियों (ओवीसी) और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का सवर्ण हिंदुओं द्वारा शोषण जारी है। बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर वे फिर अपने पूर्वजों के मार्ग पर चले जाएंगे।

बौद्ध धम्म की शुरुआत पक्की बुनियाद पर हुई है। यह मानव धर्म है। इस धम्म के अलावा मानव के कल्याण का कोई दूसरा उपयुक्त धर्म नहीं है।

हमें भारत का प्राचीन इतिहास जानना होगा। भारत में सबसे पहले आर्य और नाग लोगों में युद्ध छिड़ा। आर्यों के पास युद्ध में घोड़े थे। उनके बल पर उन्होंने नाग लोगों को हराया। वही नाग आज हिंदू हैं। नागों ने सबसे पहले बौद्ध धर्म का स्वीकार किया।

उन्हें बौद्ध धर्म के प्रसार में सफलता मिली। लेकिन इन नागों का खात्मा करने के लिए आर्यों ने समय-समय पर कोशिशें कीं। इसके सबूत महाभारत में कई बार मिलते हैं। आगे चल कर आर्यों ने ब्राह्मण धर्म को व्यापक बनाया। उसमें कई दोष निर्माण हुए। चतुरवर्ण व्यवस्था का उदय ब्राह्मणों ने ही किया। भगवान बुद्ध ने चतुरवर्ण का घोर विरोध किया। उन्होंने चतुरवर्ण को नष्ट कर समता का प्रचार किया। इसी आधार पर बौद्ध धर्म की स्थापना की। भगवान बुद्ध ने ब्राह्मणों के यज्ञों को अमान्य कर उन्हें बंद करवाया। ब्राह्मणों ने हिंसा की प्रथा की शुरुआत की थी। उसे नष्ट कर भगवान ने अहिंसा का प्रसार किया।

भगवान ने कहा है कि बौद्ध धर्म महासागर की तरह है। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। भगवान बुद्ध ने करुणा का प्रसार कर उस युग के बहुजन लोगों के मन आकर्षित किए और उन्हें सही मार्ग दिखाया।

हिंदू धर्म की जड़ों में ही रोग हुआ है। इसी कारण हमें अलग धर्म ग्रहण करना होगा। मेरी राय में बौद्ध धर्म ही योग्य धर्म है। इसमें उच्च-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पांति आदि भेदभाव नहीं हैं।

अस्पृश्य वर्ग का कल्याण बौद्ध धर्म स्वीकारने से ही होने की संभावना है। हिंदू समाज में व्याप्त असमानता, भेदाभेद, अन्याय और कुप्रथा बौद्ध धर्म के स्वीकार से दूर हो सकते हैं।

भारत के अस्पृश्यों द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकारे जाने पर बर्मा, चीन, जापान, लंका थाइलैंड, मलेशिया आदि सभी बौद्ध देशों को हमारी करुण स्थिति पर सहानुभूति होगी । और हम हमेशा के लिए हिंदू धर्म के अत्याचारों से मुक्त हो जाएंगे। ऊपर बताए देशों ने हम पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ क्यों आवाज नहीं उठाई इसके पीछे जो वजह थी यह थी कि उन्हें लगता था कि यह हिंदुओं का घरेलू झगड़ा है। अगर बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद भी हिंदू लोग हमें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व आदि से दूर रखेंगे तो हम ऊपरी बौद्ध राष्ट्रों के सहयोग से उसे पाए बगैर नहीं रहेंगे।

हिंदू धर्म के माथे पर अस्पृश्यता का कलंक लगा हुआ है। इसी के कारण हिंदू जाति के हृदय की दुष्टता दिखाई देती है। अस्पृश्य जाति पवित्र और शुद्ध होने के बाद भी अगर भगवान के दर्शन करने जाते हैं तब भी उनके लिए मंदिर के दरवाजे बंद किए जाते हैं। छुआछूत भेदभाव, जातिपांति आदि जड़ से विनाश करना सवर्ण हिंदुओं का कर्तव्य है। हम अपने कंधों पर उनकी लाश क्यों ढोएं?

आज मैं अस्पृश्यों को आवाहन करता हूं कि वे ऐसे ही धर्म को स्वीकार करें कि जिस धर्म में मनुष्यमात्र के लिए भेदभाव न हो। समता है और मित्रता के नाते वे एक साथ हो सकते हैं। यही ऊंचा आदर्श बौदध धर्म में है। जिस प्रकार कई नदियां समंदर में आकर मिलती हैं और अपना अस्तित्व भूल जाती हैं उसी प्रकार बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद ही सभी लोग समान होते हैं। उनमें किसी प्रकार की विषमता नहीं रहती । बौद्ध धम्म अस्पृश्यों के लिए ही नहीं तो सभी मानवों के लिए भी कल्याणकारी है। सवर्ण हिंदू इस धर्म को अवश्य स्वीकार करें।

अन्य धर्मों में सृष्टि का निर्माता ईश्वर समझा जाता है और जो दोष बाकी हैं उसके लिए ईश्वर को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसी विचारधारा बौद्ध धर्म में नहीं है। बौद्ध धर्म में कहा गया है कि दुनिया में दुख है। उस दुख को नष्ट किया जा सकता है यह मानकर सोचा गया है कि इस दुख को दूर करने के मार्ग क्या हैं। हिंदू धर्म की विचारधारा रूढ़ियों पर आधारित है। ये रूढियां चतुरवर्ण पद्धति से पैदा हुईं। बौद्ध धर्म में कई भिक्षु और भिक्षुणियां हुए हैं। उनके बारे में जानकारी थेर गाथा और थेरी गाथा में मिलती है।

हिंदुओं को न्याय करने का अधिकार था, लेकिन आज तक उन्होंने अस्पृश्यों के साथ केवल अन्याय ही किया है। हिंदुओं से हमें अलग होकर भगवान बुद्ध के चरणों में विनम्र होना होगा।

मुझे काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में जाने नहीं दिया गया ऐसी झूठी खबर अखबारों में प्रकाशित होने की बात मैंने सुनी। मैं किसी भी हिंदू मंदिर में नहीं जाता। मेरी सौ बार प्रार्थना की जाए तब भी मेरा उस मंदिर में जाना संभव नहीं था। मेरे निजी सचिव को नेपाल के महाराजा ने पहले दिन बुला कर सूचना की थी कि डॉक्टरसाहब को मंदिर में जाने न दें। उन्होंने कहा था कि बौद्धों को हिंदू मंदिरों में जाने देने जितने आज के हालात नहीं हैं। नेपाल, लंका और भारत के भिक्षु मंदिर में जा रहे थे उन्हें मनाही की गई। जो व्यक्ति ईश्वर में विश्वास नहीं करना उसका ऐसा करना यानी खुद के मन को धोखा देना था। हिंदुओं के ईश्वर का अपमान करना है। बौद्ध कभी भी हिंदुओं के मंदिर में न जाएं। बौद्ध विहारों में सभी समान हैं। वहां किसी का भी निषेध नहीं किया जाना चाहिए।

जो अस्पृश्य हिंदू धर्म में रहते हुए मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं यह उनका केवल दुराग्रह है। वे अगर अन्याय, अपमान और अशुद्धता सहनी हो तो फिर उनकी मर्जी है। लेकिन मुझे लगता है कि बौद्ध इस झमेले में पड़ने से बचें। हमारी हर रोज की प्रार्थना में हम कहते हैं ‘नत्थी में सरणं अञ्ञ, बुद्धों में सरणं वरं ‘ मैं बुद्ध के अलावा अन्य किसी की शरण नहीं जाऊंगा कहने वाले हिंदुओं के मंदिर में जाने का हठ क्यों करें?

काशी का मंदिर प्रवेश राजनीतिक स्टंट है। उससे दलितों का किसी भी तरह का फायदा नहीं होने वाला। इसीलिए बौद्ध धर्म को स्वीकार करके ही बंधुत्व का और समता का दर्जा प्राप्त करना इतना ही हमारा मुख्य कर्तव्य है।”

भाषण के बाद विभिन्न देशों से आए करीब 150 भिक्खुओं ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के भाषण का समर्थन कर सभी तरह से मदद देने का आश्वासन दिया।

शाम 5 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने सारनाथ के भग्न अवशेषों का निरीक्षण किया। धम्म के स्तुप के पास करीब-करीब एक घंटा रुक कर तिब्बती लामा की पूजा का अवलोकन किया। उसके बाद उन्होंने कुछ जानकारियाँ दीं जिनका सभी ने स्वागत किया।

रात 7 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने मूलगंध कुटी में विधिवत् लंबे समय तक बुद्ध पूजा की। उसके बाद उन्होंने भिक्षुओं के सूत्रपाठ सुने। साथ ही उन्होंने आधे घंटे तक तिब्बती उपदेश विधि का अवलोकन किया।

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