दिनांक 25 नवंबर, 1956 के दिन सुबह 10 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने काशी विश्वविद्यालय की विद्यार्थी परिषद का उद्घाटन किया।
डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने कहा-
आज हिंदू माने जाने वाले कई लोग नागवंशीय हैं। जो नाग लोग आर्य से पहले भारत में रहते थे वे आर्यों से अधिक सुसंस्कृत थे। उन पर आर्यों ने विजय पाई। लेकिन इससे आर्यों की संस्कृति नागों की संस्कृति से श्रेष्ठ साबित नहीं होती। आर्यों की जीत का कारण था उनका वाहन आर्य घोड़ों पर सवार होकर लड़ते थे और नाग पैदल लड़ते थे। आर्य-नागों के बीच की लड़ाई जान की बाजी लगा कर लड़ी गई। महाभारत का खांडववन और सर्पसत्र की कहानियों से कल्पना का आवरण अगर दूर किया जाए तो आर्य नाग युद्ध का भयानक स्वरूप नजर आता है। आर्यों ने खांडव वन दहन की तरह यानी scorched earth policy का इस्तेमाल कर नागों की बुरी हालत कर दी। इस विध्वंस से अगस्ती ने एक नाग की रक्षा की ऐसी कहानी बताई जाती है। कहानी में भले अत्युक्ति हो लेकिन नागों की बस्तियां पूरी तरह नष्ट करने के लिए आर्य किस प्रकार लड़ाई कर रहे थे इसकी जानकारी यहां मिलती है। पराजय के कारण नागों के मन में आर्यों के बारे में द्वेष था। परीक्षित की जान लेने वाला तक्षक कोई सर्प नहीं बल्कि एक नागवंशीय नेता था। आर्यों के मन में नागों के बारे में जो द्वेष भावना थी उसका उदाहरण देते हुए कर्ण और अनंत के कर्णार्जुन युद्ध से पूर्व हुए संभाषण का जिक्र किया जा सकता है। कर्ण – अर्जुन युद्ध से पहले अनंत नाम का नागवंशीय योद्धा कर्ण से मिला और उसने कहा कि मैं अर्जुन के खिलाफ सहायता करने का आश्वासन देता हूं। कर्ण ने उसकी सहायता लेने से इनकार किया। क्योंकि, कर्ण आर्य था और अनंत नाग था। आपसी लड़ाई में आर्यों द्वारा नागों की मदद लेना निषिद्ध था। ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच का संघर्ष बौद्धपूर्व समय का दूसरा संघर्ष था। इस लड़ाई के वर्णन आगे पुराणों में आए हैं। उसी प्रकार मनु द्वारा स्मृतियों में क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों को आदरयुक्त बर्ताव क्यों करना चाहिए इस विषय पर कारण देते हुए पूर्वकालीन ब्राह्मण-क्षत्रियों की लड़ाई का उदाहरण दिया है।
आर्य और नाग, ब्राह्मण और क्षत्रिय, इनमें संघर्ष जब जारी था तब ब्राह्मणों ने ऋग्वेद में पुरुषसूक्त का अंतर्भाव किया होगा । पुरुषसूक्त से पूर्व चतुरवर्ण के चारों वर्ण समान स्तर पर थे। पुरुष सूक्त उच्च – निम्नता का तत्व समाज में ले आया । इसी समय भगवान बुद्ध ने भारतीय जीवन में प्रवेश किया। जिस शाक्य कुल में गौतम का जन्म हुआ उन शाक्यों का गणराज्य प्रजातंत्र प्रधान था । प्रजातंत्र की इस परंपरा में बढ़े गौतम को चतुरवर्ण व्यवस्था मान्य नहीं थी। आज बौद्ध धर्म कई सिद्धांतों का महासागर बना है। लेकिन बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत अथवा बुद्धमत समता पर ही आधारित है। बौद्ध धर्म का स्वीकार करने वाले लोग ज्यादातर नागवंशी और चतुरवर्ण में हीन माने जाने वाले वर्णों में से थे। नागों को युद्ध करना प्रिय था इसके बारे में मुचलिंद नाग की कहानी से पता चलता है। मुचलिंद की अग्निहोत्री काश्यपों से दुश्मनी थी। लेकिन काश्यपों के पास आतिथ्य के लिए आए बुद्ध का वह सेवक बना। बौद्ध धर्म की अभिवृद्धि का कारण शूद्रादिशूद्रों द्वारा बहुसंख्या से उसका किया स्वीकार ही है। बौद्ध साहित्य, खासकर थेर और थेरीगाथा के आधार से यह साबित किया जा सकता है।
बौद्ध धर्म हिंदू धर्म की ही एक शाखा है इस मत का प्रसार आजकल काफी बढ़ा है। वस्तुतः बुद्धप्रणीत धर्म समकालीन था। वह वैदिक अथवा ब्राह्मण धर्म से बहुत अलग था। वैदिक वेदग्रंथों को प्रमाण मानते थे और बुद्ध वेदग्रंथों का विरोध करते थे। कलामसूक्तों में बुद्ध ने प्रतिपादन किया है कि मनुष्य को सोचने की आजादी होनी चाहिए और वेदों ने मनुष्यों के लिए हमेशा के लिए टिकाऊ सोच नहीं दी है । बुद्ध द्वारा वेदप्रामाण्य पर किए गए आघातों का आगे के समय में हिंदुओं के भगवतगीता जैसे ग्रंथ पर भी असर हुआ है। गीता में एक जगह वेदपाठकों की आलोचना करते हुए उन्हें मेंढक कहा है । बुद्ध ने वेदों को मरुस्थल कहा है। वेदों में इंद्रादि देवताओं को उम्दे घोड़े, तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र, शत्रु पर विजय आदि ऐहिक सुखों के लिए की गई प्रार्थनाएं ही मुख्यरूप से हैं। उसमें उदात्त नीतितत्वों की सीख नहीं है। इसीलिए बुद्ध ने उसका धिक्कार किया।
यज्ञसंस्थाओं पर बुद्ध द्वारा किया गया आघात उनका समकालीन धर्म पर दूसरा आघात था। याज्ञिकों से उनका सवाल हुआ करता था कि गाय-बैलों को बलि चढ़ा कर आपको कौन-सा उच्च श्रेय मिलने वाला है? यज्ञसंस्था पर बुद्ध द्वारा की गई आलोचना के कारण हिंदुओं को इंद्र- वरुणादि आदि देवताओं का त्याग करना पड़ा। थोडा विषय हट कर मैं आपसे पूछता हूं, हिंदू धर्म में जो ईश्वर की कल्पना है क्या वह सच है ? काशी के आपके पूजनीय महादेव को अगर भगवान मानें तो भी उसका ब्याह भी होता है और वह अपनी ब्याहता के साथ नाचता भी है। ब्रह्मा-विष्णू का भी वही हाल है। इन्हें कैसे भगवान कहा जा सकता है? आज सामान्य मनुष्य को भी शरम आए ऐसे बुरे कृत्य उनके हाथों हुए हैं ऐसा आपके पुराण ही बताते हैं। ऐसा एक तो भगवान बताइए जिसका निष्कलंक चरित्र आज के आदमी को आदर्श और अनुकरणीय लगे। हिंदुओं के भगवान यानी राजाओं के कुल देवता । उनके पराक्रम यानी राजा का पौरोहित्य पाने के लिए ब्राह्मणों द्वारा रची गई उनके भगवानों की खुशामद के पुराण। इंद्र, कृष्ण कैसे भगवान हैं? ऋग्वेद के आखिरी हिस्से में इंद्र की पत्नी द्वारा इंद्र को दी गई गालियां गिन कर देखिए! दुर्योधन संपूर्ण वज्रदेही ना बने और गदायुद्ध में भीम की ही विजय हो इसलिए कृष्ण का रचा कपट नाट्य देखिए ! आपका पड़ोसी अगर इस तरह का बर्ताव करने लगे तो आप उसे क्या कहेंगे? खैर । बुद्ध ने पशुहत्या की निंदा की और यज्ञों की विफलता लोगों को समझा दी। इसीलिए ब्राह्मणों को अपने प्राचीन याज्ञिक आचार छोड़ने पड़े।
आश्रम व्यवस्था के बारे में भी बुद्ध का मत प्रचलित वैदिक धर्म से अलग था। ब्राह्मणों के मतानुसार ब्रह्मचर्याश्रम के बाद गृहस्थाश्रम स्वीकारना आवश्यक था। बुद्ध के मतानुसार ब्रह्मचर्य के बाद पारिव्रज्य स्वीकारा जाना चाहिए था। ब्रह्मचर्य का मूल अर्थ है ज्ञानार्जन की स्थिति ।
अविवाहितावस्था यह अर्थ उसमें बाद में जोड़ा गया है। ब्राह्मणों ने गृहस्थाश्रम का समय बढ़ाने के लिए उसमें वानप्रस्थाश्रम जोड़ा। ब्रह्मचर्य के बाद संन्यास (परिव्रज्या ) स्वीकारने पर ब्राह्मणों को आपत्ति थी। ग्यारह सौ सालों के बाद कुमारिल भट्ट ने बुद्ध पर लगाए आरोप में बुद्ध के परिव्रज्या की आजादी पर ही जोर दिया है।
बुद्ध का वैदिक धर्म से चौथा विरोध चतुरवर्ण के लिए था। उसके शिष्य उच्च-कनिष्ट मानी गई सभी जातियों में से थे। अपने शिष्यों के बीच उच्च- निम्नता की भावना को जगह न रहे इसलिए वह बहुत दक्ष रहा करते थे। अपने चचेरे भाइयों को अपने क्षत्रियत्व का अभिमान न महसूस हो इसलिए उसने उनके साथ आई उपाली को प्रथम दीक्षा दी। जिसकी दीक्षा पहले होती है उसे बाद में दीक्षा लेने वाला वंदनीय माना करता था । इसीलिए उनके क्षत्रिय शाक्यों को उनकी पुरानी नापित सेवक को अभिवादन करना पड़ता था। अपने जीवन के आखिरी दिनों में चुंद नामक हीन जाति के माने जाने वाले लुहार के घर का खाना अपनी सेहत के लिए नुकसानदेह है यह जानते हुए भी उसने ग्रहण किया और सामाजिक समता के लिए अपने प्राणों से मोल चुकाया । इस प्रकार के कई चतुरवर्ण विरोधी प्रसंग बुद्ध के जीवन में दिखाए जा सकते हैं। वह अपने संघ को सागर की उपमा दिया करते थे। जिस प्रकार सागर से मिलने के बाद नदी का अलग अस्तित्व नहीं बचता और सारा जल एकरूप हो जाता है उसी प्रकार संघ में आने वाले भिन्न वर्णीय भिक्षुओं का वर्णवैशिष्ट्य खत्म हो जाता है। जैन मत में भी चतुरवर्ण निषिद्ध था। लेकिन इस मुद्दे पर वे झगड़ने के लिए तैयार नहीं थे। बुद्ध मात्र अपने मुद्दों के बारे में ढुलमुल मौन व्रत नहीं रखता था। अपने धर्म के हम वीर हैं और उसकी स्थापना के लिए हमें अज्ञान के साथ लड़ना तो पड़ेगा ही ऐसा उनका मानना था। बुद्ध की यह चतुरवर्ण विरोध की भावना ब्राह्मणों के मन में हमेशा चुभती रही। इसीलिए चतुरवर्ण के बारे में मूक रहने वाले निराशावादी सांख्याचार्य कपिलमुनी को उन्होंने अपना कहा लेकिन बुद्ध को हमेशा दुश्मन ही माना ।
बुद्ध का वैदिक धर्म के लिए पांचवा विरोध देवता और आत्मा के अस्तित्व के बारे में था। बुद्ध की राय में सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, न्यायी और प्रेममय भगवान का अस्तित्व ज्ञान के साधन पंचेंद्रिय और तर्क की सहायता से साबित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा धम्म का उद्देश्य दुख निवारण का है। भगवान को मानने से दुख कम नहीं होता। एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए जिससे कि सभी लोग सुखी होंगे यह सिखाना धर्म का प्रमुख काम है। इसीलिए धम्म का भगवान या ईश्वर से संबंध नहीं आता। भगवान का या ईश्वर अस्तित्व केवल खोखले तर्क पर (speculation) आधारित है और अस्तित्व की श्रद्धा के कारण पूजा, प्रार्थना, पुरोहित आदि अष्टांग मार्ग की समदृष्टि के लिए घातक मूर्ख मान्यताओं का (superstition) भंडार खुलता है। मनुष्य के परस्पर संबंध प्रज्ञा, शील, करुणा, मैत्री से नियंत्रित होने की जगह पवित्रता, उच्च-नीचता जैसी भ्रामक मान्यताओं से नियंत्रित होते हैं। भगवान के अस्तित्व के बारे में बुद्ध की आपत्तियां केवल व्यावहारिक ही थीं ऐसा नहीं है। ‘प्रतिच्च समुत्पाद’ के उनके सिद्धांत में भगवान के अस्तित्व पर आम तार्किक आपत्तियां उन्होंने उठाई हैं। इस सिद्धांत के अनुसार भगवान है या नहीं यह मुख्य सवाल नहीं है। मुख्य सवाल यह भी नहीं है कि भगवान ने दुनिया का निर्माण किया या नहीं। मुख्य सवाल यह है कि भगवान ने दुनिया का निर्माण कैसे किया ? भगवान के अस्तित्व का खंडन अथवा मंडन इस सवाल के जवाब से होगा। इस हिसाब से महत्वपूर्ण सवाल यह है- “भगवान ने इस दुनिया का निर्माण अभाव में से किया या पहले से अस्तित्व में होने वाली किसी चीज से किया?” कुछ भी नहीं था उसमें से कुछ निर्माण किया इस बात पर मनुष्य की बुद्धि विश्वास नहीं कर सकती। अगर इस तथाकथित भगवान ने यह दुनिया पहले जो कुछ था उसमें से निर्माण किया तो हमारी उत्पत्ति से भी पहले से वह अस्तित्व में थी यह मानना पड़ेगा। तो फिर जो पहले से था उसके निर्माण का कर्ता भगवान को नहीं माना जा सकता। कुल मिला कर अस्तित्व से संबंधित सोच तर्काधारित होने के कारण भगवान के प्रति श्रद्धा बुद्ध के समदृष्टि प्रधान धम्म को मान्य नहीं ।
वेदांत का मोक्ष सिद्धांत यानि आत्मा का ब्रह्म में विलीन होना भी तर्कसंगत करार देकर और मानवी जीवन सुखी करने के दृष्टिकोण से निरुपयोगी मान कर बुद्ध ने उसका विरोध किया है। ब्रह्म के बारे में बुद्ध के विचार वशिष्ट और भारद्वाज इन दो मुनियों के साथ उसके हुए संवाद से व्यक्त होते हैं। आत्मा के अस्तित्व के बारे में बुद्ध की व्यावहारिक आपत्तियां उसकी भगवान की कल्पना के बारे में जो आपत्तियां हैं उसी प्रकार की हैं। साथ ही आत्मा के नाम पर दिखाए गए कार्य व्यापार को वह नामरूप सिद्धांत के सहारे स्पष्ट कर दिखाता है। काया की उत्पत्ति के साथ ही अहसास (consciousness) की भी शुरुआत होती है । इच्छात्मक, भावात्मक और विचारात्मक कार्य अहसास के ही हैं। इसलिए आत्मा के अलग अस्तित्व को मानने की जरूरत ही नहीं है।
इस प्रकार वैदिक धर्म के विरोधी बौद्ध धम्म को नेस्तनाबूत करने के लिए ब्राह्मणों ने भले-बुरे सभी प्रकार के साधनों का प्रयोग किया। बौद्ध धम्म जिन बातों के कारण लोकप्रिय हुआ वे बातें अपने पुराने जमाने से चले आ रहे धर्म को मान्य न होने के बावजूद उन्होंने उनका उपयोग किया। इस प्रचार पद्धति को अपनाकर ही वेरुल की बौद्ध गुफाओं के पास उन्होंने अपने ब्राह्मण धर्म की गुफाएं उकेरीं। असल में ब्राह्मण गृहस्थाश्रमी । अग्निहोत्र उसका नित्यव्रत। उसे परिमार्जित भिक्षुओं की तरह गुफाओं आदि में रहने की कोई वजह दिखाई नहीं दी। बरसात के तीन महीनों तक किसी सुरक्षित जगह वास करने का बुद्ध का आदेश था। सो उन्हें गुफाओं की आवश्यकता थी। गृहस्थाश्रम में रहने वाले ब्राह्मण को वह नहीं थी। लेकिन बौद्धों की गुफाओं की ओर उपासकों का बड़ा समूह आकृष्ट होता है केवल इसीलिए उनकी गुफाओं के पास ही उन्होंने अपनी गुफाएं उकेर कर अपने धर्म की ओर उपासकों को खींचने की कोशिश की। हिंदू पंडितों के अनुसार बौद्ध धर्म के लोप होने का मुख्य कारण यह नहीं था कि कुमारिल, शंकराचार्य आदि द्वारा बौद्धमत का वाग्युद्ध में पराभव किया गया था। क्योंकि दोनों ने बुद्ध की सीख का केंद्रीय सिद्धांत – यानी सामाजिक समता, दुनिया के दुख के परिहार के लिए हर व्यक्ति का मन परिवर्तन, नीति तत्वों की सामाजिक जीवन में स्थापना, बुद्धिवाद आदि पर इन पंडितों ने कोई आघात नहीं किया है। इन दोनों पंडितों के बाद बौद्ध धर्म भारत में कई सालों तक समृद्धावस्था में था। बौद्ध धर्म के ह्रास का मुख्य कारण था जिन विभिन्न संस्कृतियों के और विभिन्न सांस्कृतिक स्तर के लोगों में उसका प्रसार हुआ, उनके आचार और मान्यताओं की बौद्ध धर्म पर हुई अनुचित प्रतिक्रिया । भारत के बौद्ध धर्म पर हुआ सबसे बड़ा आघात था इस्लामी आक्रमण । भारत की ओर आते हुए इस्लामी आक्रामकों को जो परधर्मी लोग मिले वे ज्यादातर बौद्धधर्मीय ही थे। उनकी भाषा में मूर्ति को बुत कहा जाता था। बुतशिकन यानी मूर्तिभंजक । यह उनके हिसाब से गाझीपन का लक्षण था। हिंदुओं से अधिक बौद्धों पर उनके हमले अधिक हिंसक और विध्वंसक थे। उनके द्वारा किए गए बौद्ध भिक्षुओं के कत्लों के कारण 11 से लेकर 13 वीं सदी के इतिहास के पन्ने रक्तरंजित हैं। नालंदा जैसे विश्वविख्यात बौद्ध विश्वविद्यालय का उन्होंने सर्वनाश किया। हिंदुओं की तरह ही बौद्धों में भी धर्मप्रसार का काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी करने वाला ब्राह्मणों जैसा वर्ग नहीं होने के कारण भिक्षुओं के कत्ल के बाद बौद्ध धर्म का बड़ी तेजी से लोप होने लगा। सत्य की भी कभी-कभी पराजय होती है इसका यह एक उदाहरण है। लेकिन आज उसके 600 सालों के बाद भारत को बुद्ध की याद आ रही है और आज अगर उसने बुद्ध की सीख स्वीकार नहीं की तो उसका भविष्य उज्जवल नहीं होगा ।
भाषण के बाद छात्र और अध्यापक वर्ग द्वारा पूछे गए सभी सवालों के डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने जवाब दिए। वे सवाल-जवाब एक अलग रिपोर्ट का विषय बन सकते हैं। विषय ऐतिहासिक होने के बावजूद भाषण के नए नजरिए के कारण प्रतिगामी माने गए काशी विश्वविद्यालय के छात्र और आचार्य गणों को जगाने वाला था ।
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