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  • बौद्ध धर्म हिंदु धर्म की शाखा है यह भ्रामक प्रचार है कहना एक शरारत और छलकपट है

    दिनांक 25 नवंबर, 1956 के दिन सुबह 10 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने काशी विश्वविद्यालय की विद्यार्थी परिषद का उद्घाटन किया।

    डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने कहा-

    आज हिंदू माने जाने वाले कई लोग नागवंशीय हैं। जो नाग लोग आर्य से पहले भारत में रहते थे वे आर्यों से अधिक सुसंस्कृत थे। उन पर आर्यों ने विजय पाई। लेकिन इससे आर्यों की संस्कृति नागों की संस्कृति से श्रेष्ठ साबित नहीं होती। आर्यों की जीत का कारण था उनका वाहन आर्य घोड़ों पर सवार होकर लड़ते थे और नाग पैदल लड़ते थे। आर्य-नागों के बीच की लड़ाई जान की बाजी लगा कर लड़ी गई। महाभारत का खांडववन और सर्पसत्र की कहानियों से कल्पना का आवरण अगर दूर किया जाए तो आर्य नाग युद्ध का भयानक स्वरूप नजर आता है। आर्यों ने खांडव वन दहन की तरह यानी scorched earth policy का इस्तेमाल कर नागों की बुरी हालत कर दी। इस विध्वंस से अगस्ती ने एक नाग की रक्षा की ऐसी कहानी बताई जाती है। कहानी में भले अत्युक्ति हो लेकिन नागों की बस्तियां पूरी तरह नष्ट करने के लिए आर्य किस प्रकार लड़ाई कर रहे थे इसकी जानकारी यहां मिलती है। पराजय के कारण नागों के मन में आर्यों के बारे में द्वेष था। परीक्षित की जान लेने वाला तक्षक कोई सर्प नहीं बल्कि एक नागवंशीय नेता था। आर्यों के मन में नागों के बारे में जो द्वेष भावना थी उसका उदाहरण देते हुए कर्ण और अनंत के कर्णार्जुन युद्ध से पूर्व हुए संभाषण का जिक्र किया जा सकता है। कर्ण – अर्जुन युद्ध से पहले अनंत नाम का नागवंशीय योद्धा कर्ण से मिला और उसने कहा कि मैं अर्जुन के खिलाफ सहायता करने का आश्वासन देता हूं। कर्ण ने उसकी सहायता लेने से इनकार किया। क्योंकि, कर्ण आर्य था और अनंत नाग था। आपसी लड़ाई में आर्यों द्वारा नागों की मदद लेना निषिद्ध था। ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच का संघर्ष बौद्धपूर्व समय का दूसरा संघर्ष था। इस लड़ाई के वर्णन आगे पुराणों में आए हैं। उसी प्रकार मनु द्वारा स्मृतियों में क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों को आदरयुक्त बर्ताव क्यों करना चाहिए इस विषय पर कारण देते हुए पूर्वकालीन ब्राह्मण-क्षत्रियों की लड़ाई का उदाहरण दिया है।

    आर्य और नाग, ब्राह्मण और क्षत्रिय, इनमें संघर्ष जब जारी था तब ब्राह्मणों ने ऋग्वेद में पुरुषसूक्त का अंतर्भाव किया होगा । पुरुषसूक्त से पूर्व चतुरवर्ण के चारों वर्ण समान स्तर पर थे। पुरुष सूक्त उच्च – निम्नता का तत्व समाज में ले आया । इसी समय भगवान बुद्ध ने भारतीय जीवन में प्रवेश किया। जिस शाक्य कुल में गौतम का जन्म हुआ उन शाक्यों का गणराज्य प्रजातंत्र प्रधान था । प्रजातंत्र की इस परंपरा में बढ़े गौतम को चतुरवर्ण व्यवस्था मान्य नहीं थी। आज बौद्ध धर्म कई सिद्धांतों का महासागर बना है। लेकिन बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत अथवा बुद्धमत समता पर ही आधारित है। बौद्ध धर्म का स्वीकार करने वाले लोग ज्यादातर नागवंशी और चतुरवर्ण में हीन माने जाने वाले वर्णों में से थे। नागों को युद्ध करना प्रिय था इसके बारे में मुचलिंद नाग की कहानी से पता चलता है। मुचलिंद की अग्निहोत्री काश्यपों से दुश्मनी थी। लेकिन काश्यपों के पास आतिथ्य के लिए आए बुद्ध का वह सेवक बना। बौद्ध धर्म की अभिवृद्धि का कारण शूद्रादिशूद्रों द्वारा बहुसंख्या से उसका किया स्वीकार ही है। बौद्ध साहित्य, खासकर थेर और थेरीगाथा के आधार से यह साबित किया जा सकता है।

    बौद्ध धर्म हिंदू धर्म की ही एक शाखा है इस मत का प्रसार आजकल काफी बढ़ा है। वस्तुतः बुद्धप्रणीत धर्म समकालीन था। वह वैदिक अथवा ब्राह्मण धर्म से बहुत अलग था। वैदिक वेदग्रंथों को प्रमाण मानते थे और बुद्ध वेदग्रंथों का विरोध करते थे। कलामसूक्तों में बुद्ध ने प्रतिपादन किया है कि मनुष्य को सोचने की आजादी होनी चाहिए और वेदों ने मनुष्यों के लिए हमेशा के लिए टिकाऊ सोच नहीं दी है । बुद्ध द्वारा वेदप्रामाण्य पर किए गए आघातों का आगे के समय में हिंदुओं के भगवतगीता जैसे ग्रंथ पर भी असर हुआ है। गीता में एक जगह वेदपाठकों की आलोचना करते हुए उन्हें मेंढक कहा है । बुद्ध ने वेदों को मरुस्थल कहा है। वेदों में इंद्रादि देवताओं को उम्दे घोड़े, तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र, शत्रु पर विजय आदि ऐहिक सुखों के लिए की गई प्रार्थनाएं ही मुख्यरूप से हैं। उसमें उदात्त नीतितत्वों की सीख नहीं है। इसीलिए बुद्ध ने उसका धिक्कार किया।

    यज्ञसंस्थाओं पर बुद्ध द्वारा किया गया आघात उनका समकालीन धर्म पर दूसरा आघात था। याज्ञिकों से उनका सवाल हुआ करता था कि गाय-बैलों को बलि चढ़ा कर आपको कौन-सा उच्च श्रेय मिलने वाला है? यज्ञसंस्था पर बुद्ध द्वारा की गई आलोचना के कारण हिंदुओं को इंद्र- वरुणादि आदि देवताओं का त्याग करना पड़ा। थोडा विषय हट कर मैं आपसे पूछता हूं, हिंदू धर्म में जो ईश्वर की कल्पना है क्या वह सच है ? काशी के आपके पूजनीय महादेव को अगर भगवान मानें तो भी उसका ब्याह भी होता है और वह अपनी ब्याहता के साथ नाचता भी है। ब्रह्मा-विष्णू का भी वही हाल है। इन्हें कैसे भगवान कहा जा सकता है? आज सामान्य मनुष्य को भी शरम आए ऐसे बुरे कृत्य उनके हाथों हुए हैं ऐसा आपके पुराण ही बताते हैं। ऐसा एक तो भगवान बताइए जिसका निष्कलंक चरित्र आज के आदमी को आदर्श और अनुकरणीय लगे। हिंदुओं के भगवान यानी राजाओं के कुल देवता । उनके पराक्रम यानी राजा का पौरोहित्य पाने के लिए ब्राह्मणों द्वारा रची गई उनके भगवानों की खुशामद के पुराण। इंद्र, कृष्ण कैसे भगवान हैं? ऋग्वेद के आखिरी हिस्से में इंद्र की पत्नी द्वारा इंद्र को दी गई गालियां गिन कर देखिए! दुर्योधन संपूर्ण वज्रदेही ना बने और गदायुद्ध में भीम की ही विजय हो इसलिए कृष्ण का रचा कपट नाट्य देखिए ! आपका पड़ोसी अगर इस तरह का बर्ताव करने लगे तो आप उसे क्या कहेंगे? खैर । बुद्ध ने पशुहत्या की निंदा की और यज्ञों की विफलता लोगों को समझा दी। इसीलिए ब्राह्मणों को अपने प्राचीन याज्ञिक आचार छोड़ने पड़े।

    आश्रम व्यवस्था के बारे में भी बुद्ध का मत प्रचलित वैदिक धर्म से अलग था। ब्राह्मणों के मतानुसार ब्रह्मचर्याश्रम के बाद गृहस्थाश्रम स्वीकारना आवश्यक था। बुद्ध के मतानुसार ब्रह्मचर्य के बाद पारिव्रज्य स्वीकारा जाना चाहिए था। ब्रह्मचर्य का मूल अर्थ है ज्ञानार्जन की स्थिति ।

    अविवाहितावस्था यह अर्थ उसमें बाद में जोड़ा गया है। ब्राह्मणों ने गृहस्थाश्रम का समय बढ़ाने के लिए उसमें वानप्रस्थाश्रम जोड़ा। ब्रह्मचर्य के बाद संन्यास (परिव्रज्या ) स्वीकारने पर ब्राह्मणों को आपत्ति थी। ग्यारह सौ सालों के बाद कुमारिल भट्ट ने बुद्ध पर लगाए आरोप में बुद्ध के परिव्रज्या की आजादी पर ही जोर दिया है।

    बुद्ध का वैदिक धर्म से चौथा विरोध चतुरवर्ण के लिए था। उसके शिष्य उच्च-कनिष्ट मानी गई सभी जातियों में से थे। अपने शिष्यों के बीच उच्च- निम्नता की भावना को जगह न रहे इसलिए वह बहुत दक्ष रहा करते थे। अपने चचेरे भाइयों को अपने क्षत्रियत्व का अभिमान न महसूस हो इसलिए उसने उनके साथ आई उपाली को प्रथम दीक्षा दी। जिसकी दीक्षा पहले होती है उसे बाद में दीक्षा लेने वाला वंदनीय माना करता था । इसीलिए उनके क्षत्रिय शाक्यों को उनकी पुरानी नापित सेवक को अभिवादन करना पड़ता था। अपने जीवन के आखिरी दिनों में चुंद नामक हीन जाति के माने जाने वाले लुहार के घर का खाना अपनी सेहत के लिए नुकसानदेह है यह जानते हुए भी उसने ग्रहण किया और सामाजिक समता के लिए अपने प्राणों से मोल चुकाया । इस प्रकार के कई चतुरवर्ण विरोधी प्रसंग बुद्ध के जीवन में दिखाए जा सकते हैं। वह अपने संघ को सागर की उपमा दिया करते थे। जिस प्रकार सागर से मिलने के बाद नदी का अलग अस्तित्व नहीं बचता और सारा जल एकरूप हो जाता है उसी प्रकार संघ में आने वाले भिन्न वर्णीय भिक्षुओं का वर्णवैशिष्ट्य खत्म हो जाता है। जैन मत में भी चतुरवर्ण निषिद्ध था। लेकिन इस मुद्दे पर वे झगड़ने के लिए तैयार नहीं थे। बुद्ध मात्र अपने मुद्दों के बारे में ढुलमुल मौन व्रत नहीं रखता था। अपने धर्म के हम वीर हैं और उसकी स्थापना के लिए हमें अज्ञान के साथ लड़ना तो पड़ेगा ही ऐसा उनका मानना था। बुद्ध की यह चतुरवर्ण विरोध की भावना ब्राह्मणों के मन में हमेशा चुभती रही। इसीलिए चतुरवर्ण के बारे में मूक रहने वाले निराशावादी सांख्याचार्य कपिलमुनी को उन्होंने अपना कहा लेकिन बुद्ध को हमेशा दुश्मन ही माना ।

    बुद्ध का वैदिक धर्म के लिए पांचवा विरोध देवता और आत्मा के अस्तित्व के बारे में था। बुद्ध की राय में सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, न्यायी और प्रेममय भगवान का अस्तित्व ज्ञान के साधन पंचेंद्रिय और तर्क की सहायता से साबित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा धम्म का उद्देश्य दुख निवारण का है। भगवान को मानने से दुख कम नहीं होता। एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए जिससे कि सभी लोग सुखी होंगे यह सिखाना धर्म का प्रमुख काम है। इसीलिए धम्म का भगवान या ईश्वर से संबंध नहीं आता। भगवान का या ईश्वर अस्तित्व केवल खोखले तर्क पर (speculation) आधारित है और अस्तित्व की श्रद्धा के कारण पूजा, प्रार्थना, पुरोहित आदि अष्टांग मार्ग की समदृष्टि के लिए घातक मूर्ख मान्यताओं का (superstition) भंडार खुलता है। मनुष्य के परस्पर संबंध प्रज्ञा, शील, करुणा, मैत्री से नियंत्रित होने की जगह पवित्रता, उच्च-नीचता जैसी भ्रामक मान्यताओं से नियंत्रित होते हैं। भगवान के अस्तित्व के बारे में बुद्ध की आपत्तियां केवल व्यावहारिक ही थीं ऐसा नहीं है। ‘प्रतिच्च समुत्पाद’ के उनके सिद्धांत में भगवान के अस्तित्व पर आम तार्किक आपत्तियां उन्होंने उठाई हैं। इस सिद्धांत के अनुसार भगवान है या नहीं यह मुख्य सवाल नहीं है। मुख्य सवाल यह भी नहीं है कि भगवान ने दुनिया का निर्माण किया या नहीं। मुख्य सवाल यह है कि भगवान ने दुनिया का निर्माण कैसे किया ? भगवान के अस्तित्व का खंडन अथवा मंडन इस सवाल के जवाब से होगा। इस हिसाब से महत्वपूर्ण सवाल यह है- “भगवान ने इस दुनिया का निर्माण अभाव में से किया या पहले से अस्तित्व में होने वाली किसी चीज से किया?” कुछ भी नहीं था उसमें से कुछ निर्माण किया इस बात पर मनुष्य की बुद्धि विश्वास नहीं कर सकती। अगर इस तथाकथित भगवान ने यह दुनिया पहले जो कुछ था उसमें से निर्माण किया तो हमारी उत्पत्ति से भी पहले से वह अस्तित्व में थी यह मानना पड़ेगा। तो फिर जो पहले से था उसके निर्माण का कर्ता भगवान को नहीं माना जा सकता। कुल मिला कर अस्तित्व से संबंधित सोच तर्काधारित होने के कारण भगवान के प्रति श्रद्धा बुद्ध के समदृष्टि प्रधान धम्म को मान्य नहीं ।

    वेदांत का मोक्ष सिद्धांत यानि आत्मा का ब्रह्म में विलीन होना भी तर्कसंगत करार देकर और मानवी जीवन सुखी करने के दृष्टिकोण से निरुपयोगी मान कर बुद्ध ने उसका विरोध किया है। ब्रह्म के बारे में बुद्ध के विचार वशिष्ट और भारद्वाज इन दो मुनियों के साथ उसके हुए संवाद से व्यक्त होते हैं। आत्मा के अस्तित्व के बारे में बुद्ध की व्यावहारिक आपत्तियां उसकी भगवान की कल्पना के बारे में जो आपत्तियां हैं उसी प्रकार की हैं। साथ ही आत्मा के नाम पर दिखाए गए कार्य व्यापार को वह नामरूप सिद्धांत के सहारे स्पष्ट कर दिखाता है। काया की उत्पत्ति के साथ ही अहसास (consciousness) की भी शुरुआत होती है । इच्छात्मक, भावात्मक और विचारात्मक कार्य अहसास के ही हैं। इसलिए आत्मा के अलग अस्तित्व को मानने की जरूरत ही नहीं है।

    इस प्रकार वैदिक धर्म के विरोधी बौद्ध धम्म को नेस्तनाबूत करने के लिए ब्राह्मणों ने भले-बुरे सभी प्रकार के साधनों का प्रयोग किया। बौद्ध धम्म जिन बातों के कारण लोकप्रिय हुआ वे बातें अपने पुराने जमाने से चले आ रहे धर्म को मान्य न होने के बावजूद उन्होंने उनका उपयोग किया। इस प्रचार पद्धति को अपनाकर ही वेरुल की बौद्ध गुफाओं के पास उन्होंने अपने ब्राह्मण धर्म की गुफाएं उकेरीं। असल में ब्राह्मण गृहस्थाश्रमी । अग्निहोत्र उसका नित्यव्रत। उसे परिमार्जित भिक्षुओं की तरह गुफाओं आदि में रहने की कोई वजह दिखाई नहीं दी। बरसात के तीन महीनों तक किसी सुरक्षित जगह वास करने का बुद्ध का आदेश था। सो उन्हें गुफाओं की आवश्यकता थी। गृहस्थाश्रम में रहने वाले ब्राह्मण को वह नहीं थी। लेकिन बौद्धों की गुफाओं की ओर उपासकों का बड़ा समूह आकृष्ट होता है केवल इसीलिए उनकी गुफाओं के पास ही उन्होंने अपनी गुफाएं उकेर कर अपने धर्म की ओर उपासकों को खींचने की कोशिश की। हिंदू पंडितों के अनुसार बौद्ध धर्म के लोप होने का मुख्य कारण यह नहीं था कि कुमारिल, शंकराचार्य आदि द्वारा बौद्धमत का वाग्युद्ध में पराभव किया गया था। क्योंकि दोनों ने बुद्ध की सीख का केंद्रीय सिद्धांत – यानी सामाजिक समता, दुनिया के दुख के परिहार के लिए हर व्यक्ति का मन परिवर्तन, नीति तत्वों की सामाजिक जीवन में स्थापना, बुद्धिवाद आदि पर इन पंडितों ने कोई आघात नहीं किया है। इन दोनों पंडितों के बाद बौद्ध धर्म भारत में कई सालों तक समृद्धावस्था में था। बौद्ध धर्म के ह्रास का मुख्य कारण था जिन विभिन्न संस्कृतियों के और विभिन्न सांस्कृतिक स्तर के लोगों में उसका प्रसार हुआ, उनके आचार और मान्यताओं की बौद्ध धर्म पर हुई अनुचित प्रतिक्रिया । भारत के बौद्ध धर्म पर हुआ सबसे बड़ा आघात था इस्लामी आक्रमण । भारत की ओर आते हुए इस्लामी आक्रामकों को जो परधर्मी लोग मिले वे ज्यादातर बौद्धधर्मीय ही थे। उनकी भाषा में मूर्ति को बुत कहा जाता था। बुतशिकन यानी मूर्तिभंजक । यह उनके हिसाब से गाझीपन का लक्षण था। हिंदुओं से अधिक बौद्धों पर उनके हमले अधिक हिंसक और विध्वंसक थे। उनके द्वारा किए गए बौद्ध भिक्षुओं के कत्लों के कारण 11 से लेकर 13 वीं सदी के इतिहास के पन्ने रक्तरंजित हैं। नालंदा जैसे विश्वविख्यात बौद्ध विश्वविद्यालय का उन्होंने सर्वनाश किया। हिंदुओं की तरह ही बौद्धों में भी धर्मप्रसार का काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी करने वाला ब्राह्मणों जैसा वर्ग नहीं होने के कारण भिक्षुओं के कत्ल के बाद बौद्ध धर्म का बड़ी तेजी से लोप होने लगा। सत्य की भी कभी-कभी पराजय होती है इसका यह एक उदाहरण है। लेकिन आज उसके 600 सालों के बाद भारत को बुद्ध की याद आ रही है और आज अगर उसने बुद्ध की सीख स्वीकार नहीं की तो उसका भविष्य उज्जवल नहीं होगा ।

    भाषण के बाद छात्र और अध्यापक वर्ग द्वारा पूछे गए सभी सवालों के डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने जवाब दिए। वे सवाल-जवाब एक अलग रिपोर्ट का विषय बन सकते हैं। विषय ऐतिहासिक होने के बावजूद भाषण के नए नजरिए के कारण प्रतिगामी माने गए काशी विश्वविद्यालय के छात्र और आचार्य गणों को जगाने वाला था ।

  • हर रविवार के दिन बुद्धविहार जाना हर बौद्ध धम्म अनुयायियों का पहला कर्तव्य है

    दिनांक 24 नवंबर, 1956 को दोपहर 1 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर काशी से सारनाथ आए। वे वहां के भिक्षुओं से मिले। उनसे चर्चा करते समय बाबासाहेब ने मुख्यतः इस बात पर जोर दिया कि हर रविवार के दिन हर बौद्ध को नियमित रूप से बुद्ध विहार में जाकर उपदेश ग्रहण करना चाहिए । इसी प्रकार उन्होंने हर विभाग में बुद्ध विहार निर्माण कर उसमें सभा लेने के लिए काफी जगह वाला सभागृह होना जरुरी है यह बात भी जोर देकर कही। इस नजरिए से सिलोन, ब्रह्मदेश, तिब्बत, चीन आदि देशों के भिक्षुओं ने आगे बढ़ कर और पैसा इकट्ठा कर मदद करने की सलाह दी।

    इस अवसर पर उपस्थित लोगों और भिक्खुओं को संबोधित करते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-

    ” जनता को अब गंभीरता से सोचना होगा। हिंदू धर्मग्रंथों में जिस जीवन का वर्णन किया है उसका और हमारे द्वारा तैयार किए गए संविधान में क्या कोई समानता है? अगर नहीं, तो उसके क्या कारण हो सकते हैं? अपना धर्म या संविधान इन दोनों में से किसी एक बात का हमें स्वीकार करना होगा। या तो धर्म को जिंदा रखना होगा या फिर संविधान को ही जगाना होगा। दोनों बातें एक ही जगह नहीं रह सकतीं, दोनों में कोई मेल नहीं हो सकता।

    हिंदू धर्म में कई मत हैं। उसमें शंकराचार्य का मत सबसे अच्छा माना जाता है । शंकराचार्य का ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ का सिद्धांत सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन बौद्ध धम्म के उच्च सिद्धांतों के आगे वह बेहद तुच्छ और निरर्थक है। नए-नए बने बौद्धों का आद्य कर्तव्य है कि वे हर रविवार के दिन बौद्ध विहार में जाएं। वरना नए बौद्धों का धम्म से परिचय नहीं होगा। इसके लिए जगह-जगह बुद्ध विहार का निर्माण होना चाहिए। विहार में सभा लेने के लिए जगह होनी चाहिए। लंका, बर्मा, तिब्बत, चीन आदि देशों के बौद्ध भिक्षु आगे बढ़ कर पैसा इकट्ठा करें और भारत के बौद्ध लोगों की मदद करें।

     आज सुबह उत्तर प्रदेश के पूर्व सभापति आयु. द्वारकाप्रसाद मुझे मिले थे। उनका आग्रह था कि दिसंबर में मैं जौनपुर जाऊं। मैंने उन्हें जाने का आश्वासन दिया। लेकिन तारीख अभी तय नहीं हुई है। जौनपुर में विराट सामुदायिक धर्मांतरण कार्यक्रम की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के पूर्णिया जिले के लाखों पिछड़े लोग दीक्षा लेंगे। आज भी इन पिछड़ी जातियों (ओवीसी) और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का सवर्ण हिंदुओं द्वारा शोषण जारी है। बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर वे फिर अपने पूर्वजों के मार्ग पर चले जाएंगे।

    बौद्ध धम्म की शुरुआत पक्की बुनियाद पर हुई है। यह मानव धर्म है। इस धम्म के अलावा मानव के कल्याण का कोई दूसरा उपयुक्त धर्म नहीं है।

    हमें भारत का प्राचीन इतिहास जानना होगा। भारत में सबसे पहले आर्य और नाग लोगों में युद्ध छिड़ा। आर्यों के पास युद्ध में घोड़े थे। उनके बल पर उन्होंने नाग लोगों को हराया। वही नाग आज हिंदू हैं। नागों ने सबसे पहले बौद्ध धर्म का स्वीकार किया।

    उन्हें बौद्ध धर्म के प्रसार में सफलता मिली। लेकिन इन नागों का खात्मा करने के लिए आर्यों ने समय-समय पर कोशिशें कीं। इसके सबूत महाभारत में कई बार मिलते हैं। आगे चल कर आर्यों ने ब्राह्मण धर्म को व्यापक बनाया। उसमें कई दोष निर्माण हुए। चतुरवर्ण व्यवस्था का उदय ब्राह्मणों ने ही किया। भगवान बुद्ध ने चतुरवर्ण का घोर विरोध किया। उन्होंने चतुरवर्ण को नष्ट कर समता का प्रचार किया। इसी आधार पर बौद्ध धर्म की स्थापना की। भगवान बुद्ध ने ब्राह्मणों के यज्ञों को अमान्य कर उन्हें बंद करवाया। ब्राह्मणों ने हिंसा की प्रथा की शुरुआत की थी। उसे नष्ट कर भगवान ने अहिंसा का प्रसार किया।

    भगवान ने कहा है कि बौद्ध धर्म महासागर की तरह है। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। भगवान बुद्ध ने करुणा का प्रसार कर उस युग के बहुजन लोगों के मन आकर्षित किए और उन्हें सही मार्ग दिखाया।

    हिंदू धर्म की जड़ों में ही रोग हुआ है। इसी कारण हमें अलग धर्म ग्रहण करना होगा। मेरी राय में बौद्ध धर्म ही योग्य धर्म है। इसमें उच्च-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पांति आदि भेदभाव नहीं हैं।

    अस्पृश्य वर्ग का कल्याण बौद्ध धर्म स्वीकारने से ही होने की संभावना है। हिंदू समाज में व्याप्त असमानता, भेदाभेद, अन्याय और कुप्रथा बौद्ध धर्म के स्वीकार से दूर हो सकते हैं।

    भारत के अस्पृश्यों द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकारे जाने पर बर्मा, चीन, जापान, लंका थाइलैंड, मलेशिया आदि सभी बौद्ध देशों को हमारी करुण स्थिति पर सहानुभूति होगी । और हम हमेशा के लिए हिंदू धर्म के अत्याचारों से मुक्त हो जाएंगे। ऊपर बताए देशों ने हम पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ क्यों आवाज नहीं उठाई इसके पीछे जो वजह थी यह थी कि उन्हें लगता था कि यह हिंदुओं का घरेलू झगड़ा है। अगर बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद भी हिंदू लोग हमें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व आदि से दूर रखेंगे तो हम ऊपरी बौद्ध राष्ट्रों के सहयोग से उसे पाए बगैर नहीं रहेंगे।

    हिंदू धर्म के माथे पर अस्पृश्यता का कलंक लगा हुआ है। इसी के कारण हिंदू जाति के हृदय की दुष्टता दिखाई देती है। अस्पृश्य जाति पवित्र और शुद्ध होने के बाद भी अगर भगवान के दर्शन करने जाते हैं तब भी उनके लिए मंदिर के दरवाजे बंद किए जाते हैं। छुआछूत भेदभाव, जातिपांति आदि जड़ से विनाश करना सवर्ण हिंदुओं का कर्तव्य है। हम अपने कंधों पर उनकी लाश क्यों ढोएं?

    आज मैं अस्पृश्यों को आवाहन करता हूं कि वे ऐसे ही धर्म को स्वीकार करें कि जिस धर्म में मनुष्यमात्र के लिए भेदभाव न हो। समता है और मित्रता के नाते वे एक साथ हो सकते हैं। यही ऊंचा आदर्श बौदध धर्म में है। जिस प्रकार कई नदियां समंदर में आकर मिलती हैं और अपना अस्तित्व भूल जाती हैं उसी प्रकार बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद ही सभी लोग समान होते हैं। उनमें किसी प्रकार की विषमता नहीं रहती । बौद्ध धम्म अस्पृश्यों के लिए ही नहीं तो सभी मानवों के लिए भी कल्याणकारी है। सवर्ण हिंदू इस धर्म को अवश्य स्वीकार करें।

    अन्य धर्मों में सृष्टि का निर्माता ईश्वर समझा जाता है और जो दोष बाकी हैं उसके लिए ईश्वर को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसी विचारधारा बौद्ध धर्म में नहीं है। बौद्ध धर्म में कहा गया है कि दुनिया में दुख है। उस दुख को नष्ट किया जा सकता है यह मानकर सोचा गया है कि इस दुख को दूर करने के मार्ग क्या हैं। हिंदू धर्म की विचारधारा रूढ़ियों पर आधारित है। ये रूढियां चतुरवर्ण पद्धति से पैदा हुईं। बौद्ध धर्म में कई भिक्षु और भिक्षुणियां हुए हैं। उनके बारे में जानकारी थेर गाथा और थेरी गाथा में मिलती है।

    हिंदुओं को न्याय करने का अधिकार था, लेकिन आज तक उन्होंने अस्पृश्यों के साथ केवल अन्याय ही किया है। हिंदुओं से हमें अलग होकर भगवान बुद्ध के चरणों में विनम्र होना होगा।

    मुझे काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में जाने नहीं दिया गया ऐसी झूठी खबर अखबारों में प्रकाशित होने की बात मैंने सुनी। मैं किसी भी हिंदू मंदिर में नहीं जाता। मेरी सौ बार प्रार्थना की जाए तब भी मेरा उस मंदिर में जाना संभव नहीं था। मेरे निजी सचिव को नेपाल के महाराजा ने पहले दिन बुला कर सूचना की थी कि डॉक्टरसाहब को मंदिर में जाने न दें। उन्होंने कहा था कि बौद्धों को हिंदू मंदिरों में जाने देने जितने आज के हालात नहीं हैं। नेपाल, लंका और भारत के भिक्षु मंदिर में जा रहे थे उन्हें मनाही की गई। जो व्यक्ति ईश्वर में विश्वास नहीं करना उसका ऐसा करना यानी खुद के मन को धोखा देना था। हिंदुओं के ईश्वर का अपमान करना है। बौद्ध कभी भी हिंदुओं के मंदिर में न जाएं। बौद्ध विहारों में सभी समान हैं। वहां किसी का भी निषेध नहीं किया जाना चाहिए।

    जो अस्पृश्य हिंदू धर्म में रहते हुए मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं यह उनका केवल दुराग्रह है। वे अगर अन्याय, अपमान और अशुद्धता सहनी हो तो फिर उनकी मर्जी है। लेकिन मुझे लगता है कि बौद्ध इस झमेले में पड़ने से बचें। हमारी हर रोज की प्रार्थना में हम कहते हैं ‘नत्थी में सरणं अञ्ञ, बुद्धों में सरणं वरं ‘ मैं बुद्ध के अलावा अन्य किसी की शरण नहीं जाऊंगा कहने वाले हिंदुओं के मंदिर में जाने का हठ क्यों करें?

    काशी का मंदिर प्रवेश राजनीतिक स्टंट है। उससे दलितों का किसी भी तरह का फायदा नहीं होने वाला। इसीलिए बौद्ध धर्म को स्वीकार करके ही बंधुत्व का और समता का दर्जा प्राप्त करना इतना ही हमारा मुख्य कर्तव्य है।”

    भाषण के बाद विभिन्न देशों से आए करीब 150 भिक्खुओं ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के भाषण का समर्थन कर सभी तरह से मदद देने का आश्वासन दिया।

    शाम 5 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने सारनाथ के भग्न अवशेषों का निरीक्षण किया। धम्म के स्तुप के पास करीब-करीब एक घंटा रुक कर तिब्बती लामा की पूजा का अवलोकन किया। उसके बाद उन्होंने कुछ जानकारियाँ दीं जिनका सभी ने स्वागत किया।

    रात 7 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने मूलगंध कुटी में विधिवत् लंबे समय तक बुद्ध पूजा की। उसके बाद उन्होंने भिक्षुओं के सूत्रपाठ सुने। साथ ही उन्होंने आधे घंटे तक तिब्बती उपदेश विधि का अवलोकन किया।

  • ‘ਬ੍ਰਹਮਾ ਸਤਿਆ ਜਗਨਮਿਥਿਆ’ ਇਹ ਇੱਕ ਬੌਧਿਕ ਚਾਲ ਹੈ।

    ‘ਬ੍ਰਹਮਾ ਸਤਿਆ ਜਗਨਮਿਥਿਆ’ ਇਹ ਇੱਕ ਬੌਧਿਕ ਚਾਲ ਹੈ।

    ” 23 ਨਵੰਬਰ, 1956 ਨੂੰ, ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਰਾਤ 9 ਵਜੇ ਆਸਨਸੋਲ ਪੈਸੇਂਜਰ ਰਾਹੀਂ ਪਹੁੰਚਣ ਵਾਲੇ ਸਨ, ਇਸ ਲਈ ਆਸਨਸੋਲ ਸਟੇਸ਼ਨ ‘ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਵਾਗਤ ਕਰਨ ਲਈ, ਸ਼ਹਿਰ ਦੇ ਸਤਿਕਾਰਯੋਗ ਲੋਕ, ਕਾਸ਼ੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਅਤੇ ਹਿੰਦੂ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ, ਮਹਾਬੋਧੀ ਸਭਾ ਦੇ ਵਰਕਰ ਅਤੇ ਦਲਿਤ ਵਰਗ ਦੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਉੱਥੇ ਮੌਜੂਦ ਸਨ। ਸਟੇਸ਼ਨ ‘ਤੇ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਆਯੂ. ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਰਾਇਣ ਸਿੰਘ, ਐਮਐਸਸੀ, ਭਿਕਸ਼ੂ ਧਰਮਰਕਸ਼ਿਤ, ਭਿਕਸ਼ੂ ਸੰਘਰਤਨ, ਮੇਲਾ ਅਧਿਕਾਰੀ ਆਯੂ. ਜਗਦੀਸ਼ ਸ਼ਰਨ ਸਿੰਘ, ਆਯੂ. ਜਗਨਨਾਥ ਉਪਾਧਿਆਏ ਆਦਿ। ਸਟੇਸ਼ਨ ‘ਤੇ ਬੈਂਡ ਵਜਾ ਰਿਹਾ ਸੀ ਅਤੇ ਐਲਾਨ ਕੀਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਸਨ। ਲੋਕ ਬੋਧੀ ਝੰਡਿਆਂ ਨਾਲ ਰੇਲਗੱਡੀ ਦੇ ਆਉਣ ਦੀ ਉਡੀਕ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ। ਜਿਵੇਂ ਹੀ ਰੇਲਗੱਡੀ ਆਈ, ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਦਾ ਸਵਾਗਤ ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਕੀ ਜੈ, ਅੰਬੇਡਕਰ ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ ਦੇ ਨਾਅਰਿਆਂ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਭੀੜ ਦੇ ਕਾਬੂ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੋਣ ਕਾਰਨ ਕੁਝ ਲੋਕ ਕੁਚਲ ਗਏ।

    ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਸਟੇਸ਼ਨ ਤੋਂ ‘ਹੋਟਲ ਡੀ ਪੈਰਿਸ’ ਗਏ ਅਤੇ ਖਾਣਾ ਖਾਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਉਹ ਸਾਰਨਾਥ ਲਈ ਰਵਾਨਾ ਹੋ ਗਏ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ 23 ਨਵੰਬਰ 1956 ਤੋਂ 27 ਨਵੰਬਰ 1956 ਦੀ ਦੁਪਹਿਰ ਤੱਕ ਉੱਥੇ ਨਵੇਂ ਬਣੇ ਗੈਸਟ ਹਾਊਸ ਵਿੱਚ ਰਹਿਣਾ ਸੀ। ਇਸ ਦੌਰਾਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਉੱਥੇ ਭਾਸ਼ਣ ਦਿੱਤੇ।

    24 ਨਵੰਬਰ 1956 ਨੂੰ 3 ਵਜੇ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਰਟਸ ਕਾਲਜ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿੱਚ ਕਾਸ਼ੀ ਹਿੰਦੂ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਸੰਘ ਦੁਆਰਾ ਆਯੋਜਿਤ ਮੀਟਿੰਗ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕੀਤਾ। ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਨੇ ਕਿਹਾ,

    ਮੈਨੂੰ ਇਹ ਨਹੀਂ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਕਿ ਮੈਨੂੰ ਕਿਸ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਬੋਲਣਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ, ਮੈਂ ਤੁਹਾਡੇ ਸਾਹਮਣੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਨ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹਾਂ ਜੋ ਤੁਹਾਡੇ ਹਿੰਦੂ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਕੈਂਪਸ ਵਿੱਚ ਦਾਖਲ ਹੋਣ ਵੇਲੇ ਮੇਰੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਸਨ। ਹਿੰਦੂ ਸਮਾਜਿਕ ਢਾਂਚੇ ਦੇ ਖੋਜਕਰਤਾ ਹੋਣ ਦੇ ਨਾਤੇ, ਹਿੰਦੂ ਜੀਵਨ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਦਾ ਅਧਿਐਨ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ, ਮੈਨੂੰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਵਿਚਾਰ-ਪ੍ਰਣਾਲੀਆਂ ਮਿਲੀਆਂ। ਬੁੱਧ ਯੁੱਗ ਵਿੱਚ, 92 ਦਰਸ਼ਨ ਪ੍ਰਚਲਿਤ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਛੇ ਨੂੰ ਅਧਿਐਨ ਕਰਨ ਦੇ ਯੋਗ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਮੌਜੂਦਾ ਯੁੱਗ ਦਾ ਆਮ ਹਿੰਦੂ ਸਮਾਜ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਸ਼ੰਕਰਾਚਾਰੀਆ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਨੂੰ ਅਧਿਕਾਰ ਮੰਨਦਾ ਹੈ। ਸ਼ੰਕਰਾਚਾਰੀਆ ਦਾ ਮੁੱਖ ਸਿਧਾਂਤ ‘ਬ੍ਰਹਮਾ ਸਤਯਮ ਜਗਨਮਿਥਿਆ!’ ਯਾਨੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਹੀ ਇੱਕੋ ਇੱਕ ਸੱਚ ਹੈ ਅਤੇ ਸੰਸਾਰ ਭਰਮ ਹੈ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚਾਰਾਂ ਦੀ ਹਿੰਦੂ ਮਨ ‘ਤੇ ਪੱਕੀ ਪਕੜ ਹੈ। ਮੈਨੂੰ ਨਹੀਂ ਪਤਾ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਇਸ ਬਾਰੇ ਪਹਿਲਾਂ ਸੋਚਿਆ ਹੈ ਜਾਂ ਨਹੀਂ। ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਪੁੱਛਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਇਹ ਸਿਧਾਂਤ ਕਿਸ ਹੱਦ ਤੱਕ ਮਨੁੱਖ ਲਈ ਮਾਰਗਦਰਸ਼ਕ ਸਾਬਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ? ਸ਼ੰਕਰਾਚਾਰੀਆ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਬ੍ਰਹਮਾ ਸੱਚ ਹੈ। ਪਰ ਇਸ ਸੱਚ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਕੀ ਹੈ? ਵਿਹਾਰਕ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ, ਮਨੁੱਖ ਦੀਆਂ ਪੰਜ ਇੰਦਰੀਆਂ ਉਸਨੂੰ ਸੱਚ ਅਤੇ ਅਸਤ ਵਿੱਚ ਅੰਤਰ ਦੱਸਦੀਆਂ ਹਨ। ਇੰਦਰੀਆਂ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਦਾ ਅੰਤਮ ਸਾਧਨ ਹਨ। ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਖੁਸ਼ਬੂ ਨੱਕ ਰਾਹੀਂ ਪਤਾ ਲੱਗਦੀ ਹੈ, ਯਾਨੀ ਗੰਧ ਦੀ ਭਾਵਨਾ। ਰੰਗ, ਆਕਾਰ ਆਦਿ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਰਾਹੀਂ ਪਤਾ ਲੱਗਦੇ ਹਨ। ਸੁਆਦ ਜੀਭ ਰਾਹੀਂ ਪਤਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਸ਼ੰਕਰ ਦੇ ਬ੍ਰਹਮ ਨੂੰ ‘ਨੇਤੀ ਨੇਤੀ’ ਸ਼ਬਦ ਰਾਹੀਂ ਦਰਸਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਸ਼ੰਕਰ ਦੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਨਕਾਰਾਤਮਕ ਹੈ। ਇਸ ਦੇ ਉਲਟ, ਮਹਾਂਯਾਨ ਦੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਵਿਹਾਰ ਦੀ ਕਲਪਨਾ ਸੋਚ-ਉਕਸਾਉਣ ਵਾਲੀ ਹੈ। ਉਸਦੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਵਿਹਾਰ ਵਿੱਚ ਚਾਰ ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਸਿਖਰ ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ – ਦਾਨ, ਬਲੀਦਾਨ, ਦਇਆ ਅਤੇ ਦੋਸਤੀ। ਉਸਦੀ ਨਜ਼ਰ ਵਿੱਚ, ਬ੍ਰਹਮਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਥਾਵਾਂ ‘ਤੇ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਇਹ ਚਾਰ ਗੁਣ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਸ਼ੰਕਰ ਆਪਣੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਦਾ ਠਿਕਾਣੇ ਬਾਰੇ ਪਤਾ ਲਗਣ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦਾ।

    ਕਿਸੇ ਪ੍ਰਸਤਾਵ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਅਸਲ ਸੱਚਾਈ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਸਿਰਫ਼ ਕਾਲਪਨਿਕ ਸੱਚਾਈ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਫਿਰ ਵੀ ਇਸਨੂੰ ਅਭਿਆਸ ਵਿੱਚ ਵਰਤਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਕਾਨੂੰਨ ਵਿੱਚ, ਅਸੀਂ ਸਮਾਜਿਕ ਲਾਭ ਲਈ ਕਾਨੂੰਨੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਕਾਲਪਨਿਕ ਸੱਚ (ਕਾਨੂੰਨੀ ਕਲਪਨਾ) ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਦੇ ਹਾਂ। ਉਦਾਹਰਣ ਵਜੋਂ, ਜੇਕਰ ਕਿਸੇ ਵਿਅਕਤੀ ਕੋਲ ਜ਼ਮੀਨ ਦਾ ਇੱਕ ਟੁਕੜਾ ਹੈ ਪਰ ਉਸ ਕੋਲ ਇਸ ਬਾਰੇ ਕੋਈ ਕਾਗਜ਼ਾਤ ਜਾਂ ਹੋਰ ਸਬੂਤ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਉਸਨੇ ਇਸਨੂੰ ਕਿਸ ਤੋਂ ਖਰੀਦਿਆ ਜਾਂ ਵਿਰਾਸਤ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ, ਤਾਂ ਅਦਾਲਤ ਇੱਕ ਸਿਧਾਂਤ ਬਣਾਉਂਦੀ ਹੈ ਕਿ ਉਸਨੂੰ ਜ਼ਮੀਨ ਰਾਜਾ ਤੋਂ ਤੋਹਫ਼ੇ ਵਜੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਈ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਅਜਿਹੀ ਕਾਲਪਨਿਕ ਸੱਚਾਈ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਵੀ ਗਲਤ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਸ਼ੰਕਰ ਦੱਸਦੇ ਹਨ ਕਿ ਬ੍ਰਹਮਾ ਹਰ ਥਾਂ ਹੈ। ਇਸ ਸਰਵਵਿਆਪੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਨੂੰ ਇੱਕ ਕਾਲਪਨਿਕ ਸੱਚ ਮੰਨਣ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਹਰਜ਼ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਪਰ ਫਿਰ ਇਹ ਸਮੱਸਿਆ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਜੇਕਰ ਬ੍ਰਹਮਾ ਹਰ ਥਾਂ ਹੈ ਤਾਂ ਸਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਬਰਾਬਰ ਮੰਨਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬ੍ਰਾਹਮਣਾਂ ਵਿੱਚ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸਨੂੰ ਅਛੂਤਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਫਿਰ ਬ੍ਰਾਹਮਣਾਂ ਉੱਤਮ ਅਤੇ ਅਛੂਤ ਸ਼ੂਦਰ ਵਿੱਚ ਭੇਦ ਕਿਉਂ ਹੈ?

    ਜੇਕਰ ਸ਼ੰਕਰ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਬ੍ਰਹਮਾ ਦੀ ਸਰਵਵਿਆਪੀਤਾ ਦੇ ਆਧਾਰ ‘ਤੇ ਸਾਰੀ ਮਨੁੱਖ ਜਾਤੀ ਇੱਕ ਹੈ ਅਤੇ ਸਮਾਨਤਾ ਵਿੱਚ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਰੱਖਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸਦੇ ਸਿਧਾਂਤ ਨੂੰ ਵਿਚਾਰਸ਼ੀਲ ਅਤੇ ਗੰਭੀਰ ਮੰਨਿਆ ਜਾਵੇਗਾ। ਫਿਰ ਸ਼ੰਕਰ ਨਾਲ ਬਹਿਸ ਕਰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਬਚਿਆ। ਸ਼ੰਕਰ ਵਿਰੁੱਧ ਮੇਰਾ ਇੱਕੋ ਇੱਕ ਦੋਸ਼ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ‘ਬ੍ਰਹਮ ਸਤਯਮ’ ਦੀ ਗੱਲ ਨੂੰ ਸਿਰਫ਼ ਬੌਧਿਕ ਪੱਧਰ ਤੱਕ ਸੀਮਤ ਰੱਖਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਇਸਨੂੰ ਸਮਾਜਿਕ ਪੱਧਰ ‘ਤੇ ਲਿਆਉਣ ਤੋਂ ਝਿਜਕਦਾ ਹੈ।

    ‘ਜਗਨਮਿਥਿਆ’ ਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਕਿ ਸੰਸਾਰ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਦਾ ਭਰਮ ਹੈ। ਵਿਹਾਰਕ ਪੱਧਰ ‘ਤੇ ਇਹ ਸਿਧਾਂਤ ਕਿੰਨਾ ਸਰਲ ਹੈ? ਸਾਡੀਆਂ ਇੰਦਰੀਆਂ ਸਾਨੂੰ ਸੰਸਾਰ ਦੀ ਅਸਲੀਅਤ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਕਰਵਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ, ਅਸੀਂ ਸੰਸਾਰ ਦੀ ਹੋਂਦ ਤੋਂ ਕਿਵੇਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਾਂ? ਜੇਕਰ ਸੰਸਾਰ ਖੁਦ ਮੌਜੂਦ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਤਾਂ ਤੁਸੀਂ ਅਤੇ ਮੈਂ ਕਿਵੇਂ ਮੌਜੂਦ ਹੋ ਸਕਦੇ ਹਾਂ? ਅਤੇ ਫਿਰ ਮੇਰੀਆਂ ਭਾਵਨਾਵਾਂ (ਚੇਤਨਾ) ਦਾ ਕੀ ਅਰਥ ਹੋਵੇਗਾ? ਇੱਕ ਕਹਾਣੀ ਦੱਸੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਕਿ, ਇੱਕ ਦਿਨ ਇੱਕ ਪਾਗਲ ਹਾਥੀ ਸ਼ੰਕਰ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸ਼ੰਕਰ ਆਪਣੇ ‘ਦੁਨੀਆਂ ਝੂਠੀ ਹੈ’ ਦੇ ਸਿਧਾਂਤ ਨੂੰ ਭੁੱਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਦੌੜਨਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਉਸਨੂੰ ਦੌੜਦਾ ਦੇਖ ਕੇ, ਉਸਦੇ ਆਲੇ ਦੁਆਲੇ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਕਿਹਾ, ‘ਤੂੰ ਕਿਉਂ ਭੱਜ ਰਿਹਾ ਹੈਂ? ਹਾਥੀ ਝੂਠਾ ਹੈ।’ ਸ਼ੰਕਰ ਨੇ ਦੌੜਦੇ ਹੋਏ ਜਵਾਬ ਦਿੱਤਾ, ‘ਮੇਰਾ ਦੌੜਨਾ ਵੀ ਝੂਠਾ ਹੈ।’ ਇਸ ਜਵਾਬ ਵਿੱਚ ਸ਼ੰਕਰ ਦੀ ਹਾਜਰਜਵਾਬੀ ਦਿਖਾਈ ਦੇ ਸਕਦੀ ਹੈ ਪਰ ਇਹ ਕਿਸੇ ਵੀ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀ ਨੂੰ ਸੰਤੁਸ਼ਟ ਨਹੀਂ ਕਰਦੀ। ਕੁੱਲ ਮਿਲਾ ਕੇ, ‘ਬ੍ਰਹਮਾ ਸਤਯਮ ਜਗਨਮਿਥਿਆ!’ ਇਹ ਇੱਕ ਬੌਧਿਕ ਗੜਬੜ, ਸਾਜ਼ਿਸ਼ ਜਾਂ ਚਾਲਬਾਜ਼ੀ ਹੈ। ਸ਼ੰਕਰ, ਜੋ ਉਸ ਸਿਧਾਂਤ ਵਿੱਚ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕਰਦਾ ਸੀ ਜਿਸਦਾ ਸਿਧਾਂਤਕ ਨਤੀਜਾ ਚਤੁਰਵਰਣ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਦਫ਼ਨਾਉਣਾ ਸੀ, ਸਿਰਫ ਬੌਧਿਕ ਪੱਧਰ ‘ਤੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਲਈ, ਸਮਾਜਿਕ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਇਸਦੇ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ‘ਤੇ ਪਾਬੰਦੀ ਲਗਾ ਦਿੱਤੀ। ਵਿਚਾਰ ਅਤੇ ਆਚਰਣ ਦਾ ਇਹ ਮਰੋੜ ਅਤੇ ਬੇਈਮਾਨੀ ਸ਼ੰਕਰ ਤੋਂ ਗਾਂਧੀ ਤੱਕ ਦਿਖਾਈ ਦਿੰਦੀ ਹੈ। ਮੈਂ ਇੱਕ ਵਾਰ ਗਾਂਧੀ ਨੂੰ ਪੁੱਛਿਆ ਸੀ ਕਿ ਕੀ ਉਸਦੀ ਚਤੁਰਵਰਣ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਇੱਕ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਇੱਕ ਖੜ੍ਹੀ ਹਥੇਲੀ ਦੀਆਂ ਉਂਗਲਾਂ ਵਾਂਗ ਹੈ ਜਾਂ ਇਹ ਉਸੇ ਪੱਧਰ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਝੂਠੀ ਹਥੇਲੀ ਦੀਆਂ ਉਂਗਲਾਂ ਵਾਂਗ ਹੈ? ਉਸਨੇ ਮੇਰੇ ਸਵਾਲ ਦਾ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ। ਪਰ ਬਿਨਾਂ ਸ਼ੱਕ ਉਸਦਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਗ੍ਰੇਡਿਡ ਅਸਮਾਨਤਾ ‘ਤੇ ਅਧਾਰਤ ਸੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਪੁਸਤਕਾਂ ‘ਵਰਣਵਿਵਸਥਾ’ ਅਤੇ ‘ਗਾਂਧੀ ਸਿੱਖਿਆ’ ਇਸ ਦਾ ਸਬੂਤ ਹਨ।

    ਹਿੰਦੂ ਵੇਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਰੱਖਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਰੋਜ਼ਾਨਾ ਪੁਰਸ਼ਸੂਕਤ ਦਾ ਪਾਠ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਜੇਕਰ ਇਸ ਸੂਕਤ ਨੇ ਸਿਰਫ਼ ਇਹ ਦੱਸਿਆ ਹੁੰਦਾ ਕਿ ਸਮਾਜ ਕਿਵੇਂ ਬਣਿਆ ਹੈ, ਤਾਂ ਇਹ ਇਤਰਾਜ਼ਯੋਗ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ। ਇਹ ਕਥਨ ਕਿ ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ਅਜਿਹੇ ਲੋਕ ਹਨ ਜੋ ਚਾਰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਪੇਸ਼ੇ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਇਤਿਹਾਸਕ ਸੱਚ ਸਾਬਤ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਧਾਰਮਿਕ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀਕੋਣ ਦੇ ਆਧਾਰ ‘ਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਚਾਰ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪੇਸ਼ਿਆਂ ਵਾਲੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਉੱਤਮਤਾ-ਨੀਚ, ਉੱਚ-ਨੀਚ ਦਰਜਾ ਦੇਣਾ ਸ਼ੁੱਧ ਬੇਰਹਿਮੀ ਹੈ। ਇਸੇ ਲਈ ਪੁਰਸ਼ਸੂਕਤ, ਹਿੰਦੂ ਸਮਾਜਿਕ ਢਾਂਚੇ ਦਾ ਮੂਲ ਸਿਧਾਂਤ ਜੋ ਅਸਮਾਨਤਾ ਅਤੇ ਉੱਚ-ਨੀਚ ਦਰਜੇ ਨੂੰ ਧਾਰਮਿਕ ਨੀਂਹ ਦਿੰਦਾ ਹੈ, ਹਰ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਅਸਵੀਕਾਰਨਯੋਗ ਹੈ। ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਇਸ ਪੁਰਸ਼ਸੂਕਤ ਅਤੇ ਇਸਦਾ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਹਿੰਦੂ ਗ੍ਰੰਥਾਂ ‘ਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕਰੋਗੇ ਜਾਂ ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਆਜ਼ਾਦੀ, ਸਮਾਨਤਾ, ਭਾਈਚਾਰਾ ਅਤੇ ਨਿਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਉੱਤਮ ਤੱਤਾਂ ‘ਤੇ ਅਧਾਰਤ ਰਾਜ ਦੇ ਸੰਵਿਧਾਨ ‘ਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕਰੋਗੇ? ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਗਿਆਨ ਨਾਲ ਸੁਧਾਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦੇ ਹੋ, ਇਸ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਰੋਜ਼ੀ-ਰੋਟੀ ਕਮਾਉਣ ਦਾ ਸਾਧਨ ਮੰਨਣ ਦੀ ਬਜਾਏ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਜਾਂ ਤਾਂ ਸੰਵਿਧਾਨ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗਾਵਤ ਕਰਨੀ ਪਵੇਗੀ ਜਾਂ ਅਸਮਾਨਤਾ-ਮੁਖੀ ਵੈਦਿਕ ਅਤੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਗ੍ਰੰਥਾਂ ਨੂੰ ਛੱਡਣਾ ਪਵੇਗਾ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲਈ ਕੂੜੇਦਾਨ ਵਿੱਚ ਸੁੱਟ ਦੇਣਾ ਹੋਵੇਗਾ।

    ਭਾਰਤ ਦਾ ਹਰ ਨਾਗਰਿਕ ਸੰਵਿਧਾਨ ਪ੍ਰਤੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰ ਰਹਿਣ ਲਈ ਪਾਬੰਦ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਇਮਾਨਦਾਰ ਹੋ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਉਸ ਹਿੰਦੂ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਜੋ ਤੁਹਾਡੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰੀ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਉਸ ਵਿਰੋਧ ਨੂੰ ਭੁੱਲ ਜਾਂਦੇ ਹੋ ਅਤੇ ਝਿਜਕਦ ਵਾਲੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਜੀਉਂਦੇ ਹੋ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਹ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਨਾ ਪਵੇਗਾ ਕਿ ਤੁਹਾਡੀ ਸਿੱਖਿਆ ਬੇਕਾਰ ਹੈ। ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਆਪਣੇ ਵਿਚਾਰ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਕੇ ਆਪਣਾ ਭਾਸ਼ਣ ਪੂਰਾ ਕੀਤਾ।

    ਪੰਡਿਤ ਮਾਲਵੀਆ ਦੁਆਰਾ ਹਿੰਦੂ ਸੱਭਿਆਚਾਰ ਨੂੰ ਸਥਾਈ ਰੂਪ ਦੇਣ ਲਈ ਸਥਾਪਿਤ ਬਨਾਰਸ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵਿੱਚ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਉਪਰੋਕਤ ਭਾਸ਼ਣ ਨੂੰ ਸਾਰੇ ਸਰੋਤਿਆਂ ਨੇ ਬਹੁਤ ਸ਼ਾਂਤੀ ਨਾਲ ਸੁਣਿਆ। ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰਤ ਭਾਸ਼ਣ ਅਤੇ ਠੋਸ ਸਵਾਲਾਂ ਦਾ ਸਰੋਤਿਆਂ ‘ਤੇ ਇੰਨਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਪਿਆ ਕਿ ਉਹ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਵੀ ਹੈਰਾਨ ਰਹਿ ਗਏ ਜਿਵੇਂ ਉਹ ਕਿਸੇ ਜਾਦੂ ਵਿੱਚ ਹੋਣ। ਭਾਸ਼ਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਆਯੋਜਿਤ ਰਿਫਰੈਸ਼ਮੈਂਟ ਦੌਰਾਨ, ਇੱਕ ਅਧਿਆਪਕ ਨੇ ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿਹਾ ਕਿ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਵਿੱਚ ਅਜਿਹੇ ਵਿਵਾਦਪੂਰਨ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਇੰਨਾ ਨਿਡਰ ਅਤੇ ਭਾਵੁਕ ਭਾਸ਼ਣ ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਵਿਰੋਧ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਇਹ ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਗੱਲ ਹੈ।

  • ਬੁੱਧ ਜਾਂ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ

    ਬੁੱਧ ਜਾਂ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ

    “ਕਾਠਮੰਡੂ ਦੀ ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੀ ਸਮਾਪਤੀ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ, 20 ਨਵੰਬਰ 1956 ਨੂੰ ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਦਾ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਭਾਸ਼ਣ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀਆਂ ਨੂੰ ਸੰਬੋਧਨ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਸੀ। ਇਹ ਭਾਸ਼ਣ ਨੇਪਾਲ ਦੇ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਸ਼ਾਹੀ ਦਰਬਾਰ ਵਿੱਚ ਸੀ। ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਇਸ ਦੇ ਅਲੋਪ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਕਈ ਸਾਲਾਂ ਤੱਕ ਨੇਪਾਲ ਵਿੱਚ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਆਪਣੇ ਸਿਖਰ ‘ਤੇ ਸੀ, ਪਰ ਅੱਜ ਮਨੂ-ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਅਸਮਾਨਤਾ ‘ਤੇ ਅਧਾਰਤ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਉੱਥੇ ਕਾਨੂੰਨੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਜਾਰੀ ਹੈ। ਅਜਿਹੇ ਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ, ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਲਈ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੀ ਉੱਤਮਤਾ ਬਾਰੇ ਭਾਸ਼ਣ ਦੇਣਾ ਇੱਕ ਬੇਮਿਸਾਲ ਇਨਕਲਾਬੀ ਘਟਨਾ ਸੀ। ਇਸ ਭਾਸ਼ਣ ਵਿੱਚ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਪ੍ਰਤੀ ਆਪਣੇ ਮੂਲ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀਕੋਣ ਨੂੰ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕੀਤਾ।

    20 ਨਵੰਬਰ 1956 ਨੂੰ, ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਆਖਰੀ ਦਿਨ, ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ, ਡਾ. ਜੀ. ਪੀ. ਮਲਾਲਸ਼ੇਖਰ (ਸੀਲੋਨ) ਨੇ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੂੰ ‘ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਅਹਿੰਸਾ ਦਾ ਸਥਾਨ’ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਭਾਸ਼ਣ ਦੇਣ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੀ। ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰ ਲਈ। ਪਰ ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀਆਂ ਨੇ ਜ਼ੋਰ ਦੇ ਕੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੂੰ ਇੱਕ… ਬੁੱਧ ਜਾਂ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਭਾਸ਼ਣ। ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਇਸ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਭਾਸ਼ਣ ਦੇਣ ਲਈ ਸਹਿਮਤ ਹੋਏ। ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦਾ ਸਮਾਪਤੀ ਸਮਾਰੋਹ ਦੁਪਹਿਰ 3 ਵਜੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣਾ ਸੀ। ਇਸ ਅਨੁਸਾਰ, ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਕੁਝ ਸਮਾਂ ਪਹਿਲਾਂ ਨਿਰਧਾਰਤ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਪਹੁੰਚ ਗਏ। ਜਿਵੇਂ ਹੀ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਪਹੁੰਚੇ, ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਸਾਬਕਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਤੇ ਬਰਮਾ ਦੀ ਸੁਪਰੀਮ ਕੋਰਟ ਦੇ ਮੁੱਖ ਜੱਜ, ਓਓ ਚਾਨ ਟੂਨ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪਤਨੀ ਸਤਿਕਾਰ ਨਾਲ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੂੰ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਸਟੇਜ ‘ਤੇ ਲੈ ਗਏ। ਮੌਜੂਦ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀਆਂ ਨੇ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਸਤਿਕਾਰ ਨਾਲ ਸਵਾਗਤ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਕੁਰਸੀ ‘ਤੇ ਬੈਠ ਗਏ। ਸਟੇਜ ‘ਤੇ, ਨੇਪਾਲ ਦੇ ਰਾਜਾ ਮਹਿੰਦਰ ਵੀਰ ਵਿਕਰਮ ਸਹਿਦੇਵ ਇੱਕ ਸਜਾਈ ਹੋਈ ਕੁਰਸੀ ‘ਤੇ ਬੈਠੇ। ਪੂਜਯ ਚੰਦਰਮਣੀ ਮਹਾਸਥਵੀਰ, ਜੀ.ਪੀ. ਮਲਾਲਸ਼ੇਖਰ, ਪੂਜਯ ਅੰਮ੍ਰਿਤਾਨੰਦ ਮਹਾਸਥਵੀਰ ਅਤੇ ਓਓ ਚਾਨ ਟੂਨ ਨੇੜਿਓਂ ਆਪਣੀਆਂ ਸੀਟਾਂ ‘ਤੇ ਬੈਠ ਗਏ। ਪਹਿਲਾਂ, ਪੂਜਯ ਚੰਦਰਮਣੀ ਨੇ ਮੌਜੂਦ ਪਤਵੰਤਿਆਂ ਨੂੰ ਤ੍ਰਿਸ਼ਰਨ ਅਤੇ ਪੰਚਸ਼ੀਲ ਦਿੱਤੇ। ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ, ਡਾ. ਜੀ. ਪੀ. ਮਲਾਲਸ਼ੇਖਰ ਨੇ ਕਿਹਾ-

    “ਅੱਜ ਇਸ ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਵਿੱਚ ਭਗਵਾਨ ਬੁੱਧ ਦੀ ਧਰਤੀ, ਭਾਰਤ ਤੋਂ ਇੱਕ ਮਹਾਨ ਪੁਰਸ਼ ਆਏ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਨਾਮ ਡਾ. ਬੀ. ਆਰ. ਅੰਬੇਡਕਰ ਹੈ (ਤਾੜੀਆਂ ਦੀ ਵਰਖਾ)। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਨਾਗਪੁਰ ਵਿੱਚ ਪੰਜ ਲੱਖ ਦਲਿਤ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਦਾਖਲ ਕਰਵਾ ਕੇ ਇੱਕ ਮਹਾਨ ਧੰਮਕ੍ਰਾਂਤੀ ਲਿਆਂਦੀ ਹੈ। ਅੱਜ ਇਸ ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਵਿੱਚ, ਮੈਂ ਪੂਰੀ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਦਿਲੋਂ ਸਵਾਗਤ ਕਰਦਾ ਹਾਂ।” ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਗਲੇ ਵਿੱਚ ਰੰਗ-ਬਿਰੰਗੇ ਫੁੱਲਾਂ ਦਾ ਇੱਕ ਵੱਡਾ ਹਾਰ ਪਾਇਆ। ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੂੰ ਭਾਸ਼ਣ ਦੇਣ ਲਈ ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੀ ਗਈ।

    ਡਾ. ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਅੰਬੇਡਕਰ ਖੜ੍ਹੇ ਹੋਏ ਅਤੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਤਾੜੀਆਂ ਦੀ ਗੂੰਜ ਹੋਈ। ਸਵਿਤਾਬਾਈ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਖੜ੍ਹੀ ਸੀ। ਕੈਮਰਿਆਂ ਨੇ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਤਸਵੀਰਾਂ ਖਿੱਚੀਆਂ ਅਤੇ ਫਿਰ ਸ਼ਾਂਤ ਆਵਾਜ਼ ਵਿੱਚ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ‘ਬੁੱਧ ਜਾਂ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ’ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਆਪਣਾ ਇਤਿਹਾਸਕ ਭਾਸ਼ਣ ਦਿੱਤਾ।

    ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ-

    “ਸਤਿਕਾਰਯੋਗ ਚੇਅਰਮੈਨ, ਸਤਿਕਾਰਯੋਗ ਭਿਕਸ਼ੂ ਅਤੇ ਸੱਜਣੋ, ਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਦੁੱਖ ਹੈ ਕਿ ਵਿਸ਼ਵ ਬੋਧੀ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਬਹਾਨੇ ਨੇਪਾਲ ਆਉਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ, ਮੈਂ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀ ਵਜੋਂ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਕੰਮ ਵਿੱਚ ਹਿੱਸਾ ਨਹੀਂ ਲੈ ਸਕਿਆ। ਮੈਂ ਅੱਜ ਇੱਥੇ ਮੌਜੂਦ ਹਾਂ ਪਰ ਮੈਨੂੰ ਯਕੀਨ ਹੈ ਕਿ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀਆਂ ਨੂੰ ਇਹ ਅਹਿਸਾਸ ਹੋਵੇਗਾ ਕਿ ਮੇਰੀ ਸਰੀਰਕ ਬਿਮਾਰੀ ਕਾਰਨ, ਮੈਂ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਕੰਮ ਦੀਆਂ ਗਤੀਵਿਧੀਆਂ ਅਤੇ ਸਮੱਸਿਆਵਾਂ ਨੂੰ ਸਹਿਣ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਾਂਗਾ। ਮੈਂ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦਾ ਨਿਰਾਦਰ ਕਰਨ ਲਈ ਗੈਰਹਾਜ਼ਰ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਮੈਂ ਇਸ ਲਈ ਮੌਜੂਦ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਿਆ ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਸਿਹਤ ਬਾਰੇ ਚਿੰਤਤ ਸੀ ਅਤੇ ਮੈਂ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਦੇ ਕੰਮ ਦੇ ਫਰਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਹੀਂ ਨਿਭਾ ਸਕਾਂਗਾ। ਸ਼ਾਇਦ ਪ੍ਰੀਸ਼ਦ ਤੋਂ ਗੈਰਹਾਜ਼ਰ ਰਹਿਣ ਕਾਰਨ ਹੋਏ ਨੁਕਸਾਨ ਦੀ ਭਰਪਾਈ ਕਰਨ ਲਈ, ਮੈਨੂੰ ਅੱਜ ਦੁਪਹਿਰ ਨੂੰ ਭਾਸ਼ਣ ਦੇਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਮੈਂ ਭਾਸ਼ਣ ਦੇਣ ਲਈ ਸਹਿਮਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹਾਂ ਪਰ ਇੱਥੇ ਮੌਜੂਦ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਹੀ ਇਹ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਅਚਾਨਕ ਮੈਨੂੰ ਸੌਂਪ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਮੈਨੂੰ ਬਿਲਕੁਲ ਵੀ ਅੰਦਾਜ਼ਾ ਨਹੀਂ ਸੀ ਕਿ ਮੈਨੂੰ ਤੁਹਾਡੇ ਸਾਹਮਣੇ ਭਾਸ਼ਣ ਦੇਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਜਿਸ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਬੋਲਣਾ ਹੈ, ਉਸ ਬਾਰੇ ਪੁੱਛਿਆ ਗਿਆ, ਤਾਂ ਮੈਂ ‘ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਅਹਿੰਸਾ’ ਵਿਸ਼ਾ ਸੁਝਾਇਆ ਸੀ। ਪਰ ਮੈਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਕੌਂਸਲ ਦੇ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਲੋਕ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਮੈਨੂੰ ਉਸੇ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਬੋਲਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਜਿਸਦਾ ਮੈਂ ਪਾਸਿੰਗ ਵਿੱਚ ਜ਼ਿਕਰ ਕੀਤਾ ਸੀ, ਯਾਨੀ ‘ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਅਤੇ ਸਾਮਵਾਦ’। ਇਸ ਲਈ, ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਭਾਸ਼ਣ ਦਾ ਵਿਸ਼ਾ ਬਦਲਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਹੈ, ਪਰ ਮੈਨੂੰ ਇਮਾਨਦਾਰੀ ਨਾਲ ਕਹਿਣਾ ਪਵੇਗਾ ਕਿ ਮੈਂ ਇੰਨੇ ਵੱਡੇ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਬੋਲਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਨਹੀਂ ਹਾਂ ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਵਿਸ਼ਾ ਮੈਨੂੰ ਅਚਾਨਕ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਹ ਵਿਸ਼ਾ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਵੱਡਾ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਹੈ, ਸਗੋਂ ਬਹੁਤ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਵੀ ਹੈ। ਅੱਧੀ ਤੋਂ ਵੱਧ ਦੁਨੀਆ ਇਸ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਵਿਸ਼ੇ ਦੇ ਦਬਾਅ ਹੇਠ ਫਸੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਇੰਨਾ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਬੋਧੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਨੌਜਵਾਨ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਵੀ ਇਸ ਵਿਸ਼ੇ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਹੋਏ ਹਨ। ਇਹ ਦੂਜਾ ਮੁੱਦਾ ਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਚਿੰਤਾਜਨਕ ਲੱਗਦਾ ਹੈ।

    ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਕਿਸੇ ਬੋਧੀ ਰਾਸ਼ਟਰ ਦੀ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜ੍ਹੀ ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਪ੍ਰਸ਼ੰਸਾ ਨਹੀਂ ਕਰਦੀ ਕਿ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੁਆਰਾ ਸੁਝਾਇਆ ਗਿਆ ਜੀਵਨ ਢੰਗ ਸਾਮਵਾਦ ਦੁਆਰਾ ਸੁਝਾਏ ਗਏ ਜੀਵਨ ਢੰਗ ਨਾਲੋਂ ਬਿਹਤਰ ਹੈ, ਇਹ ਨਹੀਂ ਕਿਹਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਕਿ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦਾ ਭਵਿੱਖ ਉੱਜਵਲ ਹੈ। ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਦੋ ਪੀੜ੍ਹੀਆਂ ਤੱਕ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਸਕਦਾ। ਇਸ ਲਈ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਪੱਕਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜ੍ਹੀ ਨੂੰ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੀ ਮਹੱਤਤਾ ਬਾਰੇ ਯਕੀਨ ਦਿਵਾਉਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਦੱਸਣਾ ਬਹੁਤ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ ਕਿ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਹੀ ਜੀਵਨ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵਧੀਆ ਤਰੀਕਾ ਹੈ, ਨਾ ਕਿ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਦਾ ਸਮਾਨਾਰਥੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਯਕੀਨ ਦਿਵਾਉਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਹੀ, ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੇ ਬਚਣ ਦੀ ਉਮੀਦ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਸਾਨੂੰ ਇੱਕ ਹੋਰ ਗੱਲ ਯਾਦ ਰੱਖਣੀ ਪਵੇਗੀ ਕਿ ਯੂਰਪ ਦੇ ਬਹੁਗਿਣਤੀ ਲੋਕਾਂ ਅਤੇ ਏਸ਼ੀਆ ਦੇ ਬਹੁਗਿਣਤੀ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦਾ ਇਹ ਵਿਚਾਰ ਹੈ ਕਿ ਅੱਜ ਦੀ ਦੁਨੀਆ ਵਿੱਚ, ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਹੀ ਇੱਕੋ ਇੱਕ ਮਹਾਨ ਮਨੁੱਖ ਜਾਂ ਸੰਦੇਸ਼ਵਾਹਕ ਹੈ ਜੋ ਸਤਿਕਾਰਯੋਗ ਹੈ। ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ, ਉਹ ਇਹ ਵਿਚਾਰ ਵੀ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਬੋਧੀ ਭਿੱਖੂ ਸੰਘ ਦਾ ਇੱਕ ਵੱਡਾ ਹਿੱਸਾ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਬੇਕਾਰ ਹੈ, ਸਗੋਂ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਗੰਭੀਰ ਸੰਕਟ ਵੀ ਹੈ। ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਇਸ ਗੱਲ ਵੱਲ ਧਿਆਨ ਦੇਣਾ ਹੋਵੇਗਾ ਕਿ ਇਸ ਕਿਸਮ ਦੀ ਮਾਨਸਿਕਤਾ ਕਿਸ ਦਾ ਲੱਛਣ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਸਦੀ ਪਿਛੋਕੜ ਨੂੰ ਸਮਝਣਾ ਹੋਵੇਗਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਇਸ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਢਾਲਣ ਦੀ ਪੂਰੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਨੀ ਪਵੇਗੀ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਤੁਲਨਾ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕੇ। ਤਾਂ ਹੀ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੀ ਉੱਤਮਤਾ ਸਾਬਤ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ।

    ਇਸ ਜਾਣ-ਪਛਾਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਬੋਧੀ ਦਰਸ਼ਨ ਅਤੇ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਜਾਂ ਸਾਮਵਾਦ ਦੇ ਮੁੱਖ ਖਾਸ ਮੁੱਦਿਆਂ ਬਾਰੇ ਵਿਸਥਾਰ ਵਿੱਚ ਦੱਸਾਂਗਾ। ਇਸ ਦੇ ਤਹਿਤ, ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਬੁੱਧ ਦਰਸ਼ਨ ਅਤੇ ਮਾਰਕਸ ਦਰਸ਼ਨ ਦੇ ਆਦਰਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਸਮਾਨਤਾਵਾਂ ਅਤੇ ਅੰਤਰਾਂ ਬਾਰੇ ਦੱਸਾਂਗਾ। ਮੈਂ ਇਹ ਵੀ ਵਿਸਥਾਰ ਵਿੱਚ ਚਰਚਾ ਕਰਾਂਗਾ ਕਿ ਕੀ ਬੋਧੀ ਜੀਵਨ ਢੰਗ ਜੀਵਨ ਦੇ ਉਦੇਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਜੀਵਨ ਢੰਗ ਨਾਲੋਂ ਵਧੇਰੇ ਸਥਾਈ ਹੋਵੇਗਾ। ਜੀਵਨ ਢੰਗ ਜੋ ਥੋੜ੍ਹੇ ਸਮੇਂ ਲਈ ਹੈ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਜੰਗਲ ਵਿੱਚ ਭਟਕਾਉਣ ਵਾਲਾ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਜਾਂ ਅਰਾਜਕਤਾ ਵੱਲ ਲੈ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਅਜਿਹੇ ਜੀਵਨ ਢੰਗ ਦੀ ਪਾਲਣਾ ਕਰਨਾ ਉਚਿਤ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ।

    ਪਰ ਜੇਕਰ ਤੁਹਾਨੂੰ ਜਿਸ ਰਸਤੇ ‘ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਕਰਨ ਲਈ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਉਹ ਹੌਲੀ ਰਫ਼ਤਾਰ ਵਾਲਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਹ ਬਹੁਤ ਅਧਿਕ ਅੰਤਰ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਪਰ ਭਰੋਸੇਯੋਗ, ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਦੀ ਇੱਕ ਮਜ਼ਬੂਤ ​​ਨੀਂਹ ਹੈ; ਤੁਹਾਡੇ ਆਦਰਸ਼ ਸਿਧਾਂਤਾਂ ਲਈ ਮਦਦਗਾਰ ਹੈ, ਤੁਹਾਡੇ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਸਥਿਰਤਾ ਦਿੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਸ ਰਸਤੇ ਨੂੰ ਅਪਣਾਉਣਾ ਯੋਗ ਹੋਵੇਗਾ।

    ‘ਸ਼ਾਰਟਕੱਟ’ ਰਸਤੇ ਵਜੋਂ ਜਾਣੇ ਜਾਂਦੇ ਕੰਡਿਆਲੇ ਰਸਤੇ ਦੀ ਬਜਾਏ ਲੰਬੇ ਰਸਤੇ ‘ਤੇ  ਧੀਮੇ ਚੱਲਦੇ ਰਹਿਣਾ ਲਾਭਦਾਇਕ ਹੋਵੇਗਾ, ਜਿਸਦੀ ਦੂਰੀ ਛੋਟੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਰਟਕੱਟ ਹਮੇਸ਼ਾ ਜੋਖਮ ਭਰੇ ਅਤੇ ਧੋਖੇਬਾਜ਼ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਸਾਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਇਹ ਯਾਦ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਸਿਰਫ਼ ਧੋਖੇਬਾਜ਼ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਮਹਾਂ-ਧੋਖੇਬਾਜ਼ ਵੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ।

    ਹੁਣ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਮੁੱਖ ਵਿਸ਼ੇ ਤੇ ਆਉਂਦਾ ਹਾਂ। ਮਾਰਕਸ ਦੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਆਖਰ ਵਿੱਚ ਹੈ ਕੀ? ਇਸਦਾ ਮੂਲ ਦਰਸ਼ਨ ਕੀ ਹੈ? ਇਸ ਲਈ, ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਦੀ ਮੂਲ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਅਮੀਰਾਂ ਦੁਆਰਾ ਗਰੀਬਾਂ ਦਾ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਕਿਉਂਕਿ ਅਮੀਰਾਂ ਨੂੰ ਦੌਲਤ ਦਾ ਲਾਲਚ ਹੈ। ਉਹ ਵੱਧ ਤੋਂ ਵੱਧ ਦੌਲਤ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਇਸ ਲਈ ਉਹ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਗੁਲਾਮ ਬਣਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਸ ਗੁਲਾਮੀ ਕਾਰਨ, ਤਸੀਹੇ, ਦੁੱਖ ਅਤੇ ਗਰੀਬੀ ਪੈਦਾ ਹੋਵੇਗੀ। ਇਹ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਦੀ ਜੜ੍ਹ ਹੈ। ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਇਸ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰਨ ਲਈ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਕਿਹੜੇ ਉਪਾਅ ਸੁਝਾਏ ਹਨ? ਸ਼ੋਸ਼ਿਤ ਵਰਗ ਦੀ ਗਰੀਬੀ ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰਨ ਲਈ, ਮਾਰਕਸ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਤੇ ਪਾਬੰਦੀ ਲਗਾਈ ਜਾਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਵੀ ਨਿੱਜੀ ਤੌਰ ਤੇ ਜਾਇਦਾਦ ਨਹੀਂ ਰੱਖਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਜਾਇਦਾਦ ਇਕੱਠੀ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਸਾਨੂੰ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੀ ਤਕਨੀਕੀ ਭਾਸ਼ਾ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰਨੀ ਪਵੇ, ਤਾਂ ਇਹ ਕਿਹਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜੋ ਵਿਅਕਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਜਾਂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਵਾਧੂ ਪੈਸੇ ਨਾਲ ਆਪਣਾ ਖਜ਼ਾਨਾ ਭਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਦਾ ਮਾਲਕ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਮਜ਼ਦੂਰ ਆਪਣੀ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਉਤਪਾਦਨ ਵਧਾਉਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਵਾਧੂ ਪੈਸਾ ਕਮਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਇਸ ਵਾਧੂ ਪੈਸੇ ਤੇ ਕੋਈ ਹੱਕ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਹਿੱਸਾ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦਾ। ਮਾਲਕ ਸਾਰਾ ਵਾਧੂ ਪੈਸਾ ਹੜੱਪ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਨੂੰ ਧਿਆਨ ਵਿੱਚ ਰੱਖਦੇ ਹੋਏ, ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ ਕਿ ਮਾਲਕ ਨੂੰ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੁਆਰਾ ਆਪਣੀ ਕਿਰਤ ਸ਼ਕਤੀ ਨਾਲ ਬਣਾਏ ਗਏ ਵਾਧੂ ਪੈਸੇ ਤੇ ਹੱਕ ਕਿਉਂ ਦਾਅਵਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ? ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਉਸ ਜਾਇਦਾਦ ਤੇ ਸਿਰਫ਼ ਰਾਜ ਦਾ ਹੀ ਅਧਿਕਾਰ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਹ ਰਾਜ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਕਲਪਨਾ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ, ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਾਂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਰਗ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਦਾ ਸਿਧਾਂਤ ਸਥਾਪਤ ਕੀਤਾ। ਇਹ ਮਾਰਕਸ ਦੁਆਰਾ ਸਥਾਪਿਤ ਸਿਧਾਂਤਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਤੀਜਾ ਸਿਧਾਂਤ ਹੈ। ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਰਗ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਕਿ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਦਾ ਨਹੀਂ ਸਗੋਂ ਜਿਸ ਦਾ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਉਹਨਾਂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਮੂਲ ਸਿਧਾਂਤ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹਨ। ਰੂਸ ਵਿੱਚ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਿਧਾਂਤਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ ਲਾਗੂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ, ਇਸ ਸਿਧਾਂਤ ਵਿੱਚ ਹੋਰ ਵੀ ਚੀਜ਼ਾਂ ਜੋੜੀਆਂ ਗਈਆਂ ਹਨ ਅਤੇ ਅਜੇ ਵੀ ਜੋੜੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਹਾਲਾਂਕਿ, ਮੂਲ ਸਿਧਾਂਤ ਉਹੀ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ ਜਿਵੇਂ ਪਹਿਲਾਂ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਹੈ।

    ਹੁਣ ਮੈਂ ਇੱਕ ਪਲ ਲਈ ਬੋਧੀ ਦਰਸ਼ਨ ਵੱਲ ਮੁੜਦਾ ਹਾਂ। ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਦੇਖਣਾ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਹੈ ਕਿ ਕੀ ਬੁੱਧ ਕੋਲ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੁਆਰਾ ਪੇਸ਼ ਕੀਤੇ ਗਏ ਮੂਲ ਸਿਧਾਂਤਾਂ ਬਾਰੇ ਕੁਝ ਕਹਿਣਾ ਹੈ। ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਗਰੀਬੀ ਜਾਂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਦੇ ਵਿਸ਼ੇ ਨੂੰ ਪੇਸ਼ ਕਰਕੇ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਜਾਂ ਸਾਮਵਾਦ ਦਾ ਆਪਣਾ ਸਿਧਾਂਤ ਬਣਾਇਆ ਹੈ। ਬੁੱਧ ਕੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ? ਉਹ ਕਿੱਥੋਂ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ ਸੀ? ਬੋਧੀ ਦਰਸ਼ਨ ਜਾਂ ਬੋਧੀ ਧੰਮ ਦੀ ਉਸਾਰੀ ਕਿਸ ਨੀਂਹ ‘ਤੇ ਖੜ੍ਹੀ ਹੈ? ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਵਾਂਗ, ਬੁੱਧ ਨੇ ਵੀ 2500 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ, ਯਾਨੀ ਕਿ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਤੋਂ ਕਈ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਇਹੀ ਗੱਲ ਕਹੀ ਸੀ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਦੁੱਖ ਹੈ, ਬੁੱਧ ਨੇ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਵਾਂਗ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ। ਪਰ ਬੁੱਧ ਨੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਾਰਨ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਦੁੱਖ ਅਤੇ ਗਰੀਬੀ ਬਾਰੇ ਜਾਣਕਾਰੀ ਦੇ ਕੇ ਆਪਣਾ ਦਰਸ਼ਨ, ਆਪਣਾ ਧੰਮ ਸਥਾਪਤ ਕੀਤਾ। ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਕਿ ਦੁਨੀਆ ਵਿੱਚ ਦੁੱਖ ਹੈ ਇੱਕ ਸਰਵ ਵਿਆਪਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਸਵੀਕਾਰਿਆ ਗਿਆ ਸੱਚ ਹੈ, ਬੁੱਧ ਨੇ ਦੁੱਖ ਨੂੰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਤਰੀਕਿਆਂ ਨਾਲ ਪਰਿਭਾਸ਼ਿਤ ਕੀਤਾ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਕਿਹਾ ਕਿ ਦੁੱਖ ਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਪੁਨਰ ਜਨਮ ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਜੀਵਨ ਅਤੇ ਮੌਤ ਦਾ ਚੱਕਰ। ਹਾਲਾਂਕਿ, ਮੈਂ ਇਸ ਅਰਥ ਨਾਲ ਸਹਿਮਤ ਨਹੀਂ ਹਾਂ। ਬੋਧੀ ਸਾਹਿਤ ਵਿੱਚ ਵੀ ਦੁੱਖ ਸ਼ਬਦ ਨੂੰ ਗਰੀਬੀ ਦੇ ਅਰਥਾਂ ਵਿੱਚ ਵਰਤੇ ਜਾਣ ਦੀਆਂ ਉਦਾਹਰਣਾਂ ਮਿਲਦੀਆਂ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ, ਬੋਧੀ ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ ਨੀਂਹ ਅਤੇ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ ਨੀਂਹ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਅੰਤਰ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਸਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਕਿ ਜੋ ਦਰਸ਼ਨ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੁਆਰਾ ਸਥਾਪਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ ਇਹ ਸਿਧਾਂਤ ਵੀ ਨਵਾਂ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਜੀਵਨ ਦੇ ਮੂਲ ਦੀ ਬੁਨਿਆਦ ਲੱਭਣ ਲਈ, ਕਿਸੇ ਵੀ ਬੋਧੀ ਭਰਾ ਨੂੰ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਦਰਵਾਜ਼ੇ ‘ਤੇ ਦਸਤਕ ਦੇਣ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਬੁਨਿਆਦ ਬੁੱਧ ਨੇ ਆਪਣੇ ਪਹਿਲੇ ਉਪਦੇਸ਼ ਦੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਵਿੱਚ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਢੰਗ ਨਾਲ ਸਥਾਪਿਤ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਇਸ ਉਪਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਬੋਧੀ ਸਾਹਿਤ ਵਿੱਚ ‘ਧੰਮਚਕ੍ਰਪ੍ਰਵਰਤਨ ਸੁੱਤ’ ਵਜੋਂ ਜਾਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਜਿਹੜੇ ਲੋਕ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਹਨ, ਮੈਂ ਸਿਰਫ਼ ਇਹ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਤੁਹਾਨੂੰ ‘ਧੰਮਚਕ੍ਰਪ੍ਰਵਰਤਨ’ ਸੁੱਤ ਦਾ ਅਧਿਐਨ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਸਮਝੋ ਕਿ ਬੁੱਧ ਨੇ ਕੀ ਕਿਹਾ ਹੈ। ਮੈਨੂੰ ਯਕੀਨ ਹੈ ਕਿ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਸ ਵਿੱਚ ਮਨੁੱਖੀ ਜੀਵਨ ਦੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਬਾਰੇ ਜਵਾਬ ਜ਼ਰੂਰ ਮਿਲੇਗਾ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਆਪਣਾ ਦਰਸ਼ਨ ਜਾਂ ਧੰਮ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ, ਆਤਮਾ ਜਾਂ ਅਜਿਹੀਆਂ ਮਨੁੱਖੀ ਸਮਝ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਦੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ‘ਤੇ ਨਹੀਂ ਬਣਾਇਆ ਹੈ। ਉਸਨੇ ਮਨੁੱਖਾਂ ਦੇ ਅਸਲ ਜੀਵਨ ਵੱਲ ਇਸ਼ਾਰਾ ਕਰਕੇ ਆਪਣੇ ਪੂਰੇ ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਮਨੁੱਖ ਤਸੀਹੇ ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਤੋਂ ਪ੍ਰੇਸ਼ਾਨ ਹੈ, ਇਹ ਮਨੁੱਖੀ ਜੀਵਨ ਦੀ ਅਸਲੀਅਤ ਹੈ। ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਸਿਰਫ਼ ਮਾਰਕਸ ਨੇ ਹੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ‘ਤੇ ਚਰਚਾ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਜਨਮ ਤੋਂ 2000 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ, ਬੁੱਧ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ ਸੀ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੱਲ ਵੀ ਸੁਝਾਏ ਸਨ। ਇਹ ਇੱਕ ਖਾਸ ਗੱਲ ਹੈ। ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਜਾਣਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗੇਗਾ ਕਿ ਬੁੱਧ ਦੇ ਫ਼ਲਸਫ਼ੇ ਅਤੇ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਵਿੱਚ ਗਰੀਬੀ ਬਾਰੇ ਬਹੁਤ ਸਮਾਨਤਾ ਹੈ।

    ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰਨ ਲਈ, ਰਾਜ ਨੂੰ ਉਤਪਾਦਨ ਤੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਜਾਇਦਾਦ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਰਾਜ ਸਾਰੀਆਂ ਜ਼ਮੀਨਾਂ ਦਾ ਮਾਲਕ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਰਾਜ ਦਾ ਸਾਰੇ ਉਦਯੋਗਾਂ ‘ਤੇ ਅਧਿਕਾਰ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਨਿੱਜੀ ਮਾਲਕਾਂ ਨੂੰ ਨਿਜੀ ਸਾਮਰਾਜ ਸਥਾਪਤ ਕਰਨ ਤੋਂ ਰੋਕੇਗਾ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਮਾਲਕ ਨੂੰ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਕਿਰਤ ਸ਼ਕਤੀ ਤੋਂ ਬਣੇ ਉਤਪਾਦਾਂ ‘ਤੇ ਵਾਧੂ ਮੁਨਾਫ਼ਾ ਨਹੀਂ ਮਿਲਣਾ ਚਾਹੀਦਾ, ਤਾਂ ਜੋ ਉਹ ਮਜ਼ਦੂਰ ਨੂੰ ਲੁੱਟ ਨਾ ਸਕੇ। ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੇ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਬਾਰੇ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਵਿਚਾਰ ਇਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਹਨ।

    ਆਓ ਦੇਖੀਏ ਕਿ ਨਿੱਜੀ ਮਾਲਕੀ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਬਾਰੇ ਬੁੱਧ ਦੇ ਵਿਚਾਰ ਕੀ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ, ਸਾਨੂੰ ਬੋਧੀ ਭਿਕਸ਼ੂ ਭਾਈਚਾਰੇ ਬਾਰੇ ਸੋਚਣਾ ਪਵੇਗਾ ਅਤੇ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਲਈ ਬੁੱਧ ਦੁਆਰਾ ਲਾਗੂ ਕੀਤੇ ਗਏ ਜੀਵਨ ਨਿਯਮਾਂ ਦਾ ਧਿਆਨ ਨਾਲ ਅਧਿਐਨ ਕਰਨਾ ਪਵੇਗਾ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਲਈ ਕਿਹੜੇ ਨਿਯਮ ਦਿੱਤੇ ਹਨ? ਬੁੱਧ ਨੇ ਕਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਕਿਸੇ ਵੀ ਬੋਧੀ ਭਿਕਸ਼ੂ ਨੂੰ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਨਹੀਂ ਬਣਾਉਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਜਾਂ ਰੱਖਣੀ ਚਾਹੀਦੀ। ਦਰਅਸਲ, ਇਹ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਾਰੇ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਕੋਲ ਆਪਣੀ ਜਾਇਦਾਦ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਸ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ, ਅੱਜ ਤੁਹਾਨੂੰ ਕੁਝ ਬੇਮਿਸਾਲ ਉਦਾਹਰਣਾਂ ਮਿਲਣਗੀਆਂ। ਮੈਂ ਖੁਦ ਕੁਝ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਦੀਆਂ ਆਪਣੀਆਂ ਜਾਇਦਾਦਾਂ ਦੀਆਂ ਉਦਾਹਰਣਾਂ ਦੇਖੀਆਂ ਹਨ। ਪਰ ਬਹੁਗਿਣਤੀ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਕੋਲ ਆਪਣੀ ਕੋਈ ਜਾਇਦਾਦ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਜਾਇਦਾਦ ਰੱਖਣ ਸੰਬੰਧੀ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੇ ਨਿਯਮ ਰੂਸ ਦੇ ਕਮਿਊਨਿਸਟਾਂ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਉਹਨਾ ਨਿਯਮਾਂ ਨਾਲੋਂ ਵੀ ਬਹੁਤ ਸਖ਼ਤ ਕਾਨੂੰਨ ਬਣਾਏ ਹਨ। ਅੱਜ ਤੱਕ, ਕਿਸੇ ਨੇ ਵੀ ਇਸ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਵਿਚਾਰ ਚਰਚਾ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਲਿਆ ਅਤੇ ਭਾਵੇਂ ਇਸਨੂੰ ਵਿਚਾਰ ਚਰਚਾ ਵਿੱਚ ਚੁੱਕਿਆ ਗਿਆ ਹੋਵੇ, ਇਹ ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਵਿਸ਼ਾ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਨਤੀਜੇ ‘ਤੇ ਨਹੀਂ ਪਹੁੰਚਿਆ ਗਿਆ, ਇਸੇ ਲਈ ਮੈਂ ਅੱਜ ਇਹ ਵਿਸ਼ਾ ਚੁਣਿਆ ਹੈ।

    ਭਿਕਸ਼ੂ ਸੰਘ ਬਣਾਉਣ ਪਿੱਛੇ ਬੁੱਧ ਦਾ ਕੀ ਉਦੇਸ਼ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇਗਾ? ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਹ ਕਿਉਂ ਲਗਿਆ ਕਿ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਦਾ ਸੰਘ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ? ਜੇਕਰ ਅਸੀਂ ਇਤਿਹਾਸ ‘ਤੇ ਨਜ਼ਰ ਮਾਰੀਏ, ਤਾਂ ਸਾਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗੇਗਾ ਕਿ ਜਦੋਂ ਬੁੱਧ ਆਪਣੇ ਧਰਮ ਦਾ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ, ਤਾਂ ਜੈਨ ਸਾਧੂ ਕਹਾਉਣ ਵਾਲੇ ਲੋਕ ਇੱਥੇ-ਉੱਥੇ ਘੁੰਮਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ। ਉਹ ਬੁੱਧ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਇੱਥੇ-ਉੱਥੇ ਘੁੰਮਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ। ਜੈਨ ਸਾਧੂ ਸ਼ਬਦ ਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਬੇਸਹਾਰਾ (ਨਿਰ-ਆਸਰਤ)। ਯਾਨੀ ਉਹ ਲੋਕ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਘਰ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਆਰੀਅਨ ਯੁੱਗ ਵਿੱਚ, ਆਰੀਅਨਾਂ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਸਮੂਹ ਦੂਜੇ ਜੰਗਲੀ ਸਮੂਹਾਂ ਵਾਂਗ ਆਪਸ ਵਿੱਚ ਲੜ ਰਹੇ ਸਨ। ਜਿੱਤਣ ਵਾਲਾ ਸਮੂਹ ਸਥਾਈ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਵਸ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਹਾਰਨ ਵਾਲੇ ਸਮੂਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਕੁਝ ਆਪਣੇ ਘਰ ਅਤੇ ਜਾਇਦਾਦ ਛੱਡ ਕੇ ਭਟਕਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਦੇ ਵੀ ਸਥਾਈ ਜੀਵਨ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ। ਅਜਿਹੇ ਖਾਨਾਬਦੋਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਜੈਨ ਸੰਨਿਆਸੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਅਜਿਹੇ ਭਟਕਦੇ ਜੈਨ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਇਕੱਠਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਇੱਕ ਸੰਗਠਨ ਬਣਾਉਣ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਖਾਨਾਬਦੋਸ਼ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਸਥਿਰ ਬਣਾਉਣ ਦਾ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਕੰਮ ਕੀਤਾ। ਸਾਨੂੰ ‘ਵਿਨਯਪਿਟਕ’ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸਾਰੇ ਨਿਯਮਾਂ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਮਿਲਦਾ ਹੈ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ‘ਤੇ ਅਜਿਹੇ ਜੈਨ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਤਬਦੀਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ। ਜੈਨ ਸਾਧੂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਬੋਧੀ ਭਿਕਸ਼ੂ ਬਣਾਇਆ ਅਤੇ ਵਿਨਯਪਿਟਕ ਵਿੱਚ ਦੱਸੇ ਗਏ ਨਿਯਮਾਂ ਦੀ ਸਖਤੀ ਨਾਲ ਪਾਲਣਾ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਆਪਣਾ ਜੀਵਨ ਬਤੀਤ ਕਰਨ ਲੱਗੇ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਿਯਮਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਜਾਇਦਾਦ ਜਾਂ ਸਮਾਨ ਰੱਖਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਹੇਠਾਂ ਦੱਸੀਆਂ ਗਈਆਂ ਸਿਰਫ਼ ਸੱਤ ਚੀਜ਼ਾਂ ਰੱਖਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਸੀ – ਇੱਕ ਉਸਤਰਾ, ਇੱਕ ਲੋਟਾ, ਇੱਕ ਭੀਖ ਮੰਗਣ ਵਾਲਾ ਕਟੋਰਾ, ਤਿੰਨ ਚੋਲੇ ਅਤੇ ਇੱਕ ਸੂਈ। ਜੇਕਰ ਸਾਮਵਾਦ ਦੇ ਮੂਲ ਉਦੇਸ਼ ਅਨੁਸਾਰ ਕੋਈ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਨਹੀਂ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ, ਤਾਂ ਕੀ ਵਿਨਯਪਿਟਕ ਵਿੱਚ ਬੋਧੀ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਲਈ ਦੱਸੇ ਗਏ ਕੀ ਸਖ਼ਤ ਨਿਯਮਾਂ ਵਰਗੇ ਨਿਯਮ ਹੋਣਗੇ? ਮੈਂ ਅਜਿਹੇ ਸਖ਼ਤ ਨਿਯਮ ਕਿਤੇ ਹੋਰ ਨਹੀਂ ਦੇਖੇ। ਇਸੇ ਲਈ ਜੇਕਰ ਅੱਜ ਦਾ ਨੌਜਵਾਨ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਨਾ ਰੱਖਣ ਦੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਵੱਲ ਆਕਰਸ਼ਿਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਸਨੂੰ ਬੋਧੀ ਦਰਸ਼ਨ ਦਾ ਵਿਨਯਪਿਟਕ ਜ਼ਰੂਰ ਪੜ੍ਹਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਜੋ ਵੀ ਲੱਭ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਹ ਜ਼ਰੂਰ ਇਸ ਵਿੱਚ ਪਾਵੇਗਾ। ਪਰ ਸਵਾਲ ਇਹ ਉੱਠਦਾ ਹੈ ਕਿ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਨਾ ਰੱਖਣ ਦਾ ਨਿਯਮ ਪੂਰੇ ਸਮਾਜ ‘ਤੇ ਕਿਵੇਂ ਲਾਗੂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ? ਇਹ ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਸਾਰੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਸਮੇਂ, ਹਾਲਾਤ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖੀ ਜੀਵਨ ਦੇ ਵਿਕਾਸ ‘ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ। ਜੇ ਅਸੀਂ ਸਿਧਾਂਤਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਸੋਚੀਏ, ਤਾਂ ਕੀ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨਾ ਗਲਤ ਹੈ? ਇਹ ਸੰਭਵ ਹੈ ਕਿ ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਕੀ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਰਸਤੇ ਵਿੱਚ ਆਵੇਗਾ? ਬਿਲਕੁਲ ਨਹੀਂ। ਕਿਉਂਕਿ ਬੋਧੀ ਭਿਕਸ਼ੂ ਭਾਈਚਾਰੇ ਨੂੰ ਬਣਾਉਂਦੇ ਸਮੇਂ, ਬੁੱਧ ਨੇ ਕੁਝ ਰਿਆਇਤਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਹਨ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਜ਼ਰੂਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਜਾਇਦਾਦ ਰੱਖਣ ਤੋਂ ਮਨ੍ਹਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਇਸ ਵੱਲ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਧਿਆਨ ਦੇਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ।

    ਹੁਣ ਅਸੀਂ ਇਸ ਵਿਸ਼ੇ ਦੇ ਹੋਰ ਮੁੱਦਿਆਂ ਵੱਲ ਮੁੜਦੇ ਹਾਂ। ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਜਾਂ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਸਾਨੂੰ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਲਿਆਉਣ ਲਈ ਕਿਹੜਾ ਰਸਤਾ ਦੱਸਦੇ ਹਨ? ਇਹ ਸਵਾਲ ਬਹੁਤ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਹੈ। ਕਮਿਊਨਿਸਟਾਂ ਦੁਆਰਾ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਸਥਾਪਤ ਕਰਨ ਲਈ ਸੁਝਾਇਆ ਗਿਆ ਰਸਤਾ (ਭਾਵ ਦੁੱਖਾਂ ਦੀ ਹੋਂਦ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਨਿੱਜੀ ਜਾਇਦਾਦ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰਨ ਦਾ ਤੱਤ) ਧਰਮ ਦੇ ਆਚਰਣ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਹੈ। ਇਹ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਨੂੰ ਮਾਰਨ ਦਾ ਰਸਤਾ ਹੈ। ਅਤੇ ਇਹ ਉਹ ਥਾਂ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਬੁੱਧ ਅਤੇ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਤਰੀਕਿਆਂ ਵਿੱਚ ਬੁਨਿਆਦੀ ਅੰਤਰ ਦਿਖਾਈ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਕਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਬੋਧੀ ਦਰਸ਼ਨ ਜਾਂ ਬੋਧੀ ਧੰਮ ਸਥਾਪਤ ਕਰਨ ਦਾ ਇੱਕੋ ਇੱਕ ਸਹੀ ਰਸਤਾ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਯਕੀਨ ਦਿਵਾਉਣਾ ਹੈ। ਬੁੱਧ ਨੈਤਿਕ ਸਿੱਖਿਆ ਅਤੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਦਿਲ ਜਿੱਤਣ ‘ਤੇ ਜ਼ੋਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ। ਉਹ ਆਪਣੇ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਨੂੰ ਤਾਕਤ ਨਾਲ ਜਾਂ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਜਿੱਤਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ, ਸਗੋਂ ਪਿਆਰ ਅਤੇ ਸਨੇਹ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ।

    ਜੇਕਰ ਅਸੀਂ ਇਸ ਬੁਨਿਆਦੀ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਦੇ ਹਾਂ, ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਜਾਣਾਂਗੇ ਕਿ ਬੁੱਧ ਆਪਣੇ ਦਰਸ਼ਨ ਨੂੰ ਸਥਾਪਿਤ ਕਰਨ ਲਈ ਹਿੰਸਾ ਜਾਂ ਖੂਨ-ਖਰਾਬੇ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ। ਪਰ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਤਾਕਤ ਦਾ ਰਸਤਾ ਪਸੰਦ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਇਸ ਰਸਤੇ ਰਾਹੀਂ ਤੁਰੰਤ ਨਤੀਜੇ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੇ ਹਨ ਜਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਉਦੇਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਤੁਰੰਤ ਸਫਲਤਾ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਕਿਉਂਕਿ ਜਦੋਂ ਤੁਸੀਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰਨ ਦੇ ਫਲਸਫੇ ਨਾਲ ਅੱਗੇ ਵਧਦੇ ਹੋ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਡਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰਨ ਜਾਂ ਵਿਰੋਧ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬਚਦਾ, ਯਾਨੀ ਕਿ ਅਜਿਹੀ ਸਫਲਤਾ ਸਿਰਫ ਦਿਖਾਵੇ ਲਈ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦੇ ਮੁਕਾਬਲੇ, ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦਾ ਰਸਤਾ ਹੌਲੀ ਅਤੇ ਲੰਮਾ ਹੈ। ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਹੈ ਕਿ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਬੋਰਿੰਗ ਲੱਗੇ। ਕਿਉਂਕਿ ਇਸ ਰਸਤੇ ਰਾਹੀਂ ਸਫਲਤਾ ਬਹੁਤ ਦੇਰ ਨਾਲ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਪਰ ਇਹ ਵੀ ਸੱਚ ਹੈ ਕਿ ਰਸਤਾ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਹੈ। ਤੁਹਾਡਾ ਜੀਵਨ ਯਕੀਨੀ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਆਦਰਸ਼ਾਂ ਦੇ ਰਸਤੇ ‘ਤੇ ਚੱਲ ਕੇ ਬੁੱਧ ਦੁਆਰਾ ਦਿਖਾਏ ਗਏ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਰਸਤੇ ‘ਤੇ ਅੱਗੇ ਵਧਣਾ ਲਾਭਦਾਇਕ ਹੋਵੇਗਾ।

    ਮੈਂ ਹਮੇਸ਼ਾ ਆਪਣੇ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਦੋਸਤਾਂ ਤੋਂ ਦੋ ਜਾਂ ਤਿੰਨ ਸਵਾਲਾਂ ਦੇ ਜਵਾਬ ਮੰਗਦਾ ਹਾਂ। ਪਰ ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਮਾਨਦਾਰੀ ਨਾਲ ਦੱਸਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਮੇਰੇ ਸਵਾਲਾਂ ਦੇ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ ਹਨ। ਉਹ ਹਮੇਸ਼ਾ ਖੂਨ-ਖਰਾਬੇ ਰਾਹੀਂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਰਗ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਸਥਾਪਤ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਉਹ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਸ਼ਕਤੀ ‘ਤੇ ਹਾਵੀ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਪਾਰਟੀ ਨੂੰ ਤਬਾਹ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਰਾਏ ਅਨੁਸਾਰ, ਲੋਕ ਸਭਾ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧਤਾ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ। ਵੋਟਿੰਗ ਅਧਿਕਾਰ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੇ। ਉਹ ਰਾਜ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਮਹਾਪ੍ਰਗਿਆ ਵਜੋਂ ਬਣੇ ਰਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਉਹ ਸ਼ਕਤੀ ਜਾਂ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਨੂੰ ਵੰਡੇ ਬਿਨਾਂ ਰਾਜ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਪੁੱਛਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਕੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਲੋਕਾਂ ‘ਤੇ ਰਾਜ ਕਰਨ ਦਾ ਸਹੀ ਤਰੀਕਾ ਹੈ। ਇਸ ਦਾ ਜਵਾਬ ਉਹ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਦੇ ਵੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ। ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦੁਬਾਰਾ ਪੁੱਛਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਨੂੰ ਕਿਉਂ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਦਾ ਜਵਾਬ ਉਹ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਇੱਕ ਨਿਰਣਾਇਕ ਦੌਰ ਹੈ, ਇਸ ਲਈ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਬਣਾਉਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ।

    ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਰਗ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ, ਸਥਾਪਤ ਪੂੰਜੀਪਤੀਆਂ ਅਤੇ ਵਾਧੂ ਦੌਲਤ ਹੜੱਪਣ ਵਾਲੇ ਮਾਲਕਾਂ ਦਾ ਅੰਤ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ। ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪੁੱਛਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਨਿਰਣਾਇਕ ਦੌਰ ਕਿੰਨਾ ਚਿਰ ਰਹੇਗਾ – ਵੀਹ, ਚਾਲੀ ਜਾਂ ਪੰਜਾਹ ਸਾਲ? ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਇਸ ਦਾ ਕੋਈ ਠੋਸ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਉਹ ਇੱਕ ਅਸਪਸ਼ਟ ਜਵਾਬ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਦੇ ਸਥਿਰ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਰਗ ਦੀ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਖਤਮ ਹੋ ਜਾਵੇਗੀ। ਠੀਕ ਹੈ, ਮੰਨ ਲਓ ਕਿ ਇਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਖਤਮ ਹੋ ਗਿਆ। ਫਿਰ ਅੱਗੇ ਕੀ? ਇਸਦੀ ਜਗ੍ਹਾ ਕੌਣ ਲਵੇਗਾ? ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਇਸ ਸਵਾਲ ਦਾ ਕੋਈ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ ਹੈ।

    ਇਸ ਸੰਦਰਭ ਵਿੱਚ, ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਬੁੱਧ ਵੱਲ ਮੁੜਦੇ ਹਾਂ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਧੰਮ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਸਵਾਲ ਉਠਾਉਂਦੇ ਹਾਂ, ਤਾਂ ਉਹ ਕੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ? ਬੁੱਧ ਨੇ ਦੁਨੀਆ ਨੂੰ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਗੱਲ ਦੱਸੀ। ਬੁੱਧ ਦੀਆਂ ਸਿੱਖਿਆਵਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਮਾਨਸਿਕਤਾ ਵਿੱਚ ਤਬਦੀਲੀ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਦੁਨੀਆ ਵਿੱਚ ਸੁਧਾਰ ਜਾਂ ਤਰੱਕੀ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਕਿਸੇ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਮਾਨਸਿਕਤਾ ਬਦਲ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉਸ ਅਨੁਸਾਰ ਉਹ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਇਸਨੂੰ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਪਿਆਰ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਇਹ ਯਕੀਨੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਸਥਾਈ ਰੂਪ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਅਜਿਹੀਆਂ ਸਥਿਤੀਆਂ ਵਿੱਚ, ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਕਾਨੂੰਨ ਅਤੇ ਵਿਵਸਥਾ ਦੇ ਬੰਧਨਾਂ ਵਿੱਚ ਬੰਨ੍ਹਣ ਲਈ ਫੌਜੀ ਜਾਂ ਪੁਲਿਸ ਕਾਰਵਾਈ ਦੀ ਕੋਈ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗੀ। ਅਜਿਹਾ ਕਿਉਂ ਹੋਵੇਗਾ? ਇਸਦਾ ਜਵਾਬ ਇਹ ਹੈ ਕਿ, ਜਦੋਂ ਬੁੱਧ ਤੁਹਾਡੇ ਮਨ ਨੂੰ ਨੈਤਿਕ ਵਿਵਹਾਰ ਅਤੇ ਸਹੀ ਰਸਤੇ ‘ਤੇ ਚੱਲਣ ਲਈ ਤਿਆਰ ਕਰਨਗੇ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਡਾ ਮਨ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲਈ ਸਹੀ ਰਸਤੇ ‘ਤੇ ਚੱਲੇਗਾ, ਫਿਰ ਤੁਹਾਨੂੰ ਸਹੀ ਰਸਤੇ ‘ਤੇ ਧੱਕਣ ਲਈ ਕਿਸੇ ਬਾਹਰੀ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਰਹੇਗੀ।

    ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਦੇ ਖਾਤਮੇ ਸੰਬੰਧੀ ਵਿਚਾਰ ਤਾਕਤ ‘ਤੇ ਅਧਾਰਤ ਹਨ। ਕਲਪਨਾ ਕਰੋ ਕਿ ਕੱਲ੍ਹ ਕੀ ਹੋਵੇਗਾ ਜੇਕਰ ਰੂਸ ਦੀ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹੀ ਅਸਫਲ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਜਾਂ ਅਜਿਹੇ ਲੱਛਣ ਦਿਖਾਈ ਦੇਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦੇ ਹਨ? ਮੈਂ ਇਹ ਜਾਣਨ ਲਈ ਉਤਸੁਕ ਹੋਵਾਂਗਾ ਕਿ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਕੀ ਹੋਵੇਗੀ। ਮੇਰੀ ਕਲਪਨਾ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਰਾਜ ਦੀ ਮਾਲਕੀ ਵਾਲੀ ਜਾਇਦਾਦ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨ ਲਈ ਰੂਸੀ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਖੂਨੀ ਲੜਾਈਆਂ ਹੋਣਗੀਆਂ। ਇਹ ਇੱਕ ਅਟੱਲ ਨਤੀਜਾ ਹੋਵੇਗਾ। ਕਿਉਂਕਿ ਰੂਸ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਸਵੈ-ਇੱਛਾ ਨਾਲ ਜਾਂ ਕੁਦਰਤੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਇਹ ਉਨ੍ਹਾਂ ‘ਤੇ ਜ਼ਬਰਦਸਤੀ ਥੋਪਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਸਥਾਪਤ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਡਰਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਕਿ ਜੇਕਰ ਉਹ ਕਮਿਊਨਿਸਟ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ, ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਫਾਂਸੀ ‘ਤੇ ਚੜ੍ਹਾ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇਗਾ ਅਤੇ ਇਸੇ ਲਈ ਉਹ ਹੁਣ ਤੱਕ ਚੁੱਪ-ਚਾਪ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਨੂੰ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਹ ਯਾਦ ਰੱਖਣਾ ਹੋਵੇਗਾ ਕਿ ਕੋਈ ਵੀ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਡਰ ਕਾਰਨ ਜੜ੍ਹ ਨਹੀਂ ਫੜ ਸਕਦੀ। ਜੇਕਰ ਕਿਸੇ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਸਮੇਂ ਦੇ ਬੀਤਣ ਨਾਲ ਇਸਦੀ ਧਾਰਨ ਸ਼ਕਤੀ ਖਤਮ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਇਸ ਸਵਾਲ ਦਾ ਜਵਾਬ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਕਿ ਭਵਿੱਖ ਵਿੱਚ ਉਸ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਦਾ ਕੀ ਹੋਵੇਗਾ, ਇਹ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿੱਚ ਜਗ੍ਹਾ ਨਹੀਂ ਪਾ ਸਕਦੀ। ਜੇਕਰ ਮਾਨਸਿਕਤਾ ਨਹੀਂ ਬਣਾਈ ਜਾਂਦੀ, ਤਾਂ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹਮੇਸ਼ਾ ਮਹਿਸੂਸ ਹੁੰਦੀ ਰਹੇਗੀ। ਇਹੀ ਕਾਰਨ ਹੈ ਕਿ ਮੈਂ ਹਮੇਸ਼ਾ ਬੁੱਧ ਵੱਲ ਆਕਰਸ਼ਿਤ ਰਿਹਾ ਹਾਂ। ਬੁੱਧ ਦੀ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਲੋਕਤੰਤਰ ਦੀ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਹੈ।

    ਅਜਾਤਸ਼ਤ੍ਰੂ ਵਾਜਜੀ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ। ਅਜਾਤਸ਼ਤ੍ਰੂ ਦਾ ਸੈਨਾਪਤੀ ਬੁੱਧ ਕੋਲ ਇਹ ਦੱਸਣ ਲਈ ਆਇਆ। ਬੁੱਧ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜਿੰਨਾ ਚਿਰ ਵਾਜਜੀ ਆਪਣੇ ਰਾਜ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਪੁਰਾਣੀ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਅਨੁਸਾਰ ਚਲਾ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਸਨੂੰ ਹਰਾਉਣਾ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਿ ਬੁੱਧ ਨੇ ਵਾਜਜੀ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ। ਪਰ ਉਸਨੇ ਜੋ ਵੀ ਕਿਹਾ, ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਕਿ ਇਹ ਵਾਜਜੀਆਂ ਦੇ ਲੋਕਤੰਤਰੀ ਅਤੇ ਗਣਤੰਤਰ ਰੂਪ ਦੇ ਸ਼ਾਸਨ ਬਾਰੇ ਸੀ। ਇਸੇ ਲਈ ਬੁੱਧ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜਿੰਨਾ ਚਿਰ ਵਾਜਜੀ ਆਪਣੇ ਪੁਰਾਣੇ ਤਰੀਕਿਆਂ ਦੀ ਪਾਲਣਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਇਹ ਕਦੇ ਵੀ ਹਾਰਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਸ ਤੋਂ ਪਤਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਬੁੱਧ ਲੋਕਤੰਤਰ ਦਾ ਇੱਕ ਵੱਡਾ ਸਮਰਥਕ ਸੀ।

    ਸ਼੍ਰੀਮਾਨ ਚੇਅਰਮੈਨ, ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦਿਓ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਤੁਹਾਡਾ ਧਿਆਨ ਇਸ ਤੱਥ ਵੱਲ ਖਿੱਚਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਮੈਂ ਰਾਜਨੀਤੀ ਸ਼ਾਸਤਰ ਦਾ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਸੀ, ਮੈਂ ਅਰਥ ਸ਼ਾਸਤਰ ਦਾ ਵੀ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਸੀ, ਇੰਨਾ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਮੈਂ ਅਰਥ ਸ਼ਾਸਤਰ ਦਾ ਵੀ ਅਧਿਆਪਕ ਸੀ। ਮੇਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦਾ ਇੱਕ ਵੱਡਾ ਹਿੱਸਾ ਕਾਰਲ ਮਾਰਕਸ, ਸਾਮਵਾਦ ਅਤੇ ਹੋਰ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਵਿਸ਼ਿਆਂ ਦਾ ਅਧਿਐਨ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਬਿਤਾਇਆ ਹੈ। ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ, ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦਾ ਬਹੁਤ ਸਾਰਾ ਸਮਾਂ ਬੁੱਧ ਦੇ ਧੰਮ ਬਾਰੇ ਸਿੱਖਣ ਵਿੱਚ ਵੀ ਬਿਤਾਇਆ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਬੋਧੀ ਦਰਸ਼ਨ ਅਤੇ ਮਾਰਕਸਵਾਦ ਦਾ ਤੁਲਨਾਤਮਕ ਅਧਿਐਨ ਕੀਤਾ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਇਸ ਸਿੱਟੇ ‘ਤੇ ਪਹੁੰਚਿਆ ਕਿ ਬੁੱਧ ਦਾ ਮਾਰਗ ਦੁਨੀਆ ਦੀ ਇੱਕ ਵੱਡੀ ਸਮੱਸਿਆ ਨੂੰ ਹੱਲ ਕਰਨ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵਧੀਆ ਤਰੀਕਾ ਹੈ, ਯਾਨੀ ਕਿ ਦੁਨੀਆ ਵਿੱਚ ਦੁੱਖ ਹਨ ਅਤੇ ਇਸਨੂੰ ਹੱਲ ਕਰਨ ਦਾ ਇੱਕ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਹੱਲ ਹੈ। ਇਹ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਅਤੇ ਮਜ਼ਬੂਤ ​​ਵੀ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਬੋਧੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਬੁੱਧ ਦੇ ਯਥਾਰਥਵਾਦੀ ਦਰਸ਼ਨ ਵੱਲ ਵਧੇਰੇ ਧਿਆਨ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਸਦਾ ਪਾਲਣ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਕਦੇ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ‘ਤੇ ਸੰਕਟ ਦਾ ਸਮਾਂ ਆਉਂਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਬੋਧੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰ ਠਹਿਰਾਉਣਾ ਪਵੇਗਾ ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਨਿੱਜੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਫਰਜ਼ ਸਰੀਰ, ਮਨ ਅਤੇ ਧਨ ਨਾਲ ਪੂਰੇ ਕਰਨੇ ਚਾਹੀਦੇ ਸਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ, ਇਸਦਾ ਮਤਲਬ ਇਹੀ ਹੈ। ਅੱਜ ਧਰਮ ਦਾ ਪ੍ਰਸਾਰ ਕਿੱਥੇ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ? ਅੱਜ ਬੋਧੀ ਧਰਮ ਦੀ ਕੀ ਸਥਿਤੀ ਹੈ? ਇੱਕ ਭਿਕਸ਼ੂ ਦਾ ਅਸਲ ਫਰਜ਼ ਧਰਮ ਦਾ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਨਾ ਹੈ। ਤਾਂ ਅੱਜ ਭਿਕਸ਼ੂ ਕੀ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ? ਅੱਜ ਦਾ ਭਿਕਸ਼ੂ ਖਾਣ-ਪੀਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਮੱਠ ਵਿੱਚ ਬੈਠਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਕਿ ਉਹ ਦਿਨ ਵਿੱਚ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਵਾਰ ਹੀ ਖਾਂਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਉਸਦਾ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਸਮਾਂ ਆਲਸ ਵਿੱਚ ਬਿਤਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਥੋੜ੍ਹਾ ਜਿਹਾ ਪੜ੍ਹਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਉਹ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਸੌਂਦਾ ਹੈ। ਸ਼ਾਮ ਨੂੰ, ਸੰਗੀਤ ਨਾਲ ਆਪਣਾ ਮਨੋਰੰਜਨ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਇਹ ਧੰਮ ਫੈਲਾਉਣ ਦਾ ਤਰੀਕਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਦੋਸਤੋ, ਮੇਰਾ ਇਰਾਦਾ ਕਿਸੇ ਦੀ ਆਲੋਚਨਾ ਕਰਨ ਦਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਪਰ ਜੇਕਰ ਧੰਮ ਵਿੱਚ ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ਨਵੀਂ ਜਾਗ੍ਰਿਤੀ ਲਿਆਉਣ ਦੀ ਨੈਤਿਕ ਤਾਕਤ ਹੈ, ਤਾਂ ਧੰਮ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਕੰਨਾਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇੱਕ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਸਕੂਲ ਵਿੱਚ ਕਿੰਨੇ ਸਾਲ ਬਿਤਾਉਣੇ ਪੈਂਦੇ ਹਨ? ਤੁਸੀਂ ਇੱਕ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਦਿਨ ਲਈ ਸਕੂਲ ਨਹੀਂ ਭੇਜਦੇ। ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਤੁਸੀਂ ਉਸ ਤੋਂ ਘਰ ਬੈਠ ਕੇ ਸਾਰਾ ਗਿਆਨ ਗ੍ਰਹਿਣ ਕਰਨ, ਸਾਰਾ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਦੀ ਉਮੀਦ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ। ਬੱਚਾ ਹਰ ਰੋਜ਼ ਸਕੂਲ ਜਾਂਦਾ ਸੀ, ਉੱਥੇ ਪੰਜ ਘੰਟੇ ਬਿਤਾਉਂਦਾ ਸੀ, ਲਗਾਤਾਰ ਪੜ੍ਹਾਈ ਕਰਦਾ ਸੀ, ਤਾਂ ਹੀ ਉਹ ਥੋੜ੍ਹਾ ਜਿਹਾ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਜਗ੍ਹਾ ਦੇ ਭਿਕਸ਼ੂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਇੱਕ ਦਿਨ ਲਈ ਵੀ ਮੱਠ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਬੁਲਾਉਂਦੇ, ਨਾ ਹੀ ਉਹ ਕਿਸੇ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਸਿੱਖਿਆ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਜਾਂ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਘੱਟੋ ਘੱਟ, ਮੈਂ ਅਜਿਹਾ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਦੇਖਿਆ।

    ਇੱਕ ਵਾਰ ਮੈਂ ਸੀਲੋਨ ਗਿਆ ਸੀ। ਮੈਂ ਉੱਥੇ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਿ ਮੈਂ ਦੇਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਭਿਕਸ਼ੂ ਧੰਮ ਕਿਵੇਂ ਫੈਲਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਦਾਨ ਦੀ ਇੱਕ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਹੈ। ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਮੈਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਕਿ ਵਣਕ ਨੂੰ ਦਾਨ ਦੇ ਅਰਥਾਂ ਵਿੱਚ ਵਰਤਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਲਗਭਗ 11 ਵਜੇ ਇੱਕ ਜਗ੍ਹਾ ਲੈ ਗਏ। ਉੱਥੇ ਇੱਕ ਮੇਜ਼ ਦੇ ਆਕਾਰ ਦਾ ਮੰਜਾ ਸੀ।

    ਮੈਂ ਫਰਸ਼ ‘ਤੇ ਬੈਠ ਗਿਆ। ਕੁਝ ਦੇਰ ਬਾਅਦ ਇੱਕ ਭਿਕਸ਼ੂ ਆਇਆ। ਉੱਥੇ ਮੌਜੂਦ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਮਰਦਾਂ ਅਤੇ ਔਰਤਾਂ ਨੇ ਉਸਦੇ ਪੈਰ ਪਾਣੀ ਨਾਲ ਧੋਤੇ। ਫਿਰ ਉਹ ਫਰਸ਼ ‘ਤੇ ਬੈਠ ਗਿਆ। ਉਸਦੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਹਵਾ ਲਈ ਇੱਕ ਪੱਖਾ ਸੀ। ਉਹ ਕੁਝ ਬੁੜਬੁੜਾਇਆ। ਪਰ ਉਹ ਜੋ ਬੁੜਬੁੜਾਇਆ ਉਹ ਸਿਰਫ਼ ਉਸਨੂੰ ਹੀ ਪਤਾ ਹੈ। ਯਾਨੀ, ਉਸਨੇ ਸਿੰਹਾਲੀ ਭਾਸ਼ਾ ਵਿੱਚ ਧੰਮ ਫੈਲਾਇਆ ਹੋਵੇਗਾ। ਪਰ ਉਹ ਵੀ ਸਿਰਫ਼ ਦੋ ਮਿੰਟਾਂ ਲਈ! ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਹ ਉੱਠਿਆ ਅਤੇ ਚਲਾ ਗਿਆ।

    ਤੁਸੀਂ ਜਾਓ ਅਤੇ ਦੇਖੋ ਕਿ ਈਸਾਈ ਚਰਚ ਵਿੱਚ ਕੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਲੋਕ ਹਰ ਹਫ਼ਤੇ ਉੱਥੇ ਇਕੱਠੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਉਹ ਉੱਥੇ ਪ੍ਰਾਰਥਨਾ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਧਾਰਮਿਕ ਆਗੂ ਬਾਈਬਲ ਦੇ ਕਿਸੇ ਵਿਸ਼ੇ ‘ਤੇ ਉਪਦੇਸ਼ ਦਿੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਯਿਸੂ ਦੀ ਕਹੀ ਗੱਲ ਸਮਝਾਉਂਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਉਸ ਚੰਗੀ ਸਲਾਹ ਨੂੰ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਯਾਦ ਰੱਖਣ ਦੀ ਅਪੀਲ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਹ ਜਾਣ ਕੇ ਹੈਰਾਨੀ ਹੋਵੇਗੀ ਕਿ ਲਗਭਗ 90 ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਈਸਾਈ ਧਰਮ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਤੋਂ ਲਿਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਸਿਧਾਂਤਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਅਤੇ ਰਚਨਾਤਮਕ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀਕੋਣ ਤੋਂ। ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਰੋਮ ਜਾਂਦੇ ਹੋ ਅਤੇ ਇਸਦਾ ਮੁੱਖ ਚਰਚ ਦੇਖਦੇ ਹੋ, ਤਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਉੱਥੇ ਵਿਸ਼ਵਕਰਮਾ ਮੰਦਰ ਦੀ ਯਾਦ ਆਵੇਗੀ।

    ਚੀਨ ਵਿੱਚ ਵਿਸ਼ਬਿਗਨੇ ਨਾਮ ਦਾ ਇੱਕ ਈਸਾਈ ਪ੍ਰਚਾਰਕ ਸੀ। ਉਸਨੇ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਕਿਤਾਬ ਵੀ ਲਿਖੀ ਹੈ। ਉਸਨੇ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਅਤੇ ਈਸਾਈ ਧਰਮ ਵਿਚਕਾਰ ਹੈਰਾਨੀਜਨਕ ਸਮਾਨਤਾ ‘ਤੇ ਹੈਰਾਨੀ ਪ੍ਰਗਟ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਹਾਲਾਂਕਿ ਉਹ ਇਹ ਕਹਿਣ ਦੀ ਹਿੰਮਤ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਿਹਾ ਕਿ ਬੋਧੀਆਂ ਨੇ ਈਸਾਈਆਂ ਦੀ ਨਕਲ ਕੀਤੀ ਹੈ, ਪਰ ਉਹ ਅਜੇ ਵੀ ਇਹ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਨ ਲਈ ਤਿਆਰ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਈਸਾਈਆਂ ਨੇ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੀ ਨਕਲ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਇਸ ਬਾਰੇ ਦੱਸਣ ਲਈ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਹੈ।

    ਹੁਣ ਸਮਾਂ ਬਹੁਤ ਬਦਲ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਕਿ ਈਸਾਈਆਂ ਨੇ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੀ ਨਕਲ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਪਰ ਜੇਕਰ ਬੋਧੀ ਆਪਣੇ ਧਰਮ ਦੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਲਈ ਈਸਾਈਆਂ ਦੁਆਰਾ ਅਪਣਾਏ ਗਏ ਰਸਤੇ ਦੀ ਨਕਲ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ। ਭਾਵੇਂ ਉਹ ਆਪਣੇ ਰਸਤੇ ਤੋਂ ਭਟਕ ਜਾਣ, ਬੁੱਧ ਦਾ ਧੰਮ ਹਮੇਸ਼ਾ ਇੱਕ ਪੁਲਿਸ ਵਾਲੇ ਵਾਂਗ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮਾਰਗਦਰਸ਼ਨ ਕਰਨ ਲਈ ਮੌਜੂਦ ਰਹੇਗਾ। ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਲੋਕ ਇਸਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ, ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੇ ਪਤਨ ਨੂੰ ਰੋਕਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ। ਅੱਜ ਵੀ, ਬੋਧੀ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਬਹੁਤ ਬੁਰੀ ਹਾਲਤ ਵਿੱਚ ਹੈ। ਇਸ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ, ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਅਜੇ ਵੀ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਰੱਖਦਾ ਹੈ।

    ਜਾਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ, ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇੱਕ ਦਿਲਚਸਪ ਅਤੇ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਗੱਲ ਦੱਸਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ। ਮੈਂ ਇਹ ਬਰਮਾ ਵਿੱਚ ਦੇਖਿਆ। ਮੈਨੂੰ ਉੱਥੇ ਇੱਕ ਕੌਂਸਲ ਲਈ ਬੁਲਾਇਆ ਗਿਆ ਸੀ। ਫਿਰ ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਇੱਕ ਪਿੰਡ ਲੈ ਗਏ ਤਾਂ ਜੋ ਮੈਨੂੰ ਦਿਖਾਇਆ ਜਾ ਸਕੇ ਕਿ ਬਰਮਾ ਵਿੱਚ ਪਿੰਡਾਂ ਦਾ ਪੁਨਰ ਨਿਰਮਾਣ ਕਿਵੇਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ।

    ਮੈਂ ਬਹੁਤ ਖੁਸ਼ ਸੀ। ਉੱਥੇ ਇੱਕ ਕਮੇਟੀ ਨੇ ਪਿੰਡ ਦੇ ਪੁਨਰ ਨਿਰਮਾਣ ਲਈ ਇੱਕ ਢਾਂਚਾ ਬਣਾਇਆ ਸੀ। ਉਸ ਪਿੰਡ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸੜਕਾਂ ਕਿਸੇ ਵੀ ਹੋਰ ਪਿੰਡ ਵਾਂਗ ਟੇਢੀਆਂ ਅਤੇ ਅਸੰਗਠਿਤ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸੜਕਾਂ ਨੂੰ ਸਿੱਧਾ ਕਰਨਾ ਪਿਆ। ਇਸ ਲਈ, ਕਮੇਟੀ ਨੇ ਲੋਹੇ ਦੇ ਥੰਮ੍ਹ ਬਣਾਏ ਅਤੇ ਰੱਸੀਆਂ ਬੰਨ੍ਹੀਆਂ ਅਤੇ ਸੜਕਾਂ ਨੂੰ ਸਿੱਧਾ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ। ਮੈਂ ਦੇਖਿਆ ਕਿ ਕਮੇਟੀ ਵੱਲੋਂ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਢਾਂਚਾ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਨਿੱਜੀ ਜ਼ਮੀਨ ਵਿੱਚੋਂ ਲੰਘ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪੁੱਛਿਆ ਕਿ ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ ਕਮੇਟੀ ਸੜਕ ਕਿਵੇਂ ਬਣਾ ਸਕੇਗੀ? ਕੀ ਕਮੇਟੀ ਕੋਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਮੁਆਵਜ਼ਾ ਦੇਣ ਲਈ ਇੰਨੇ ਪੈਸੇ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਨਿੱਜੀ ਜ਼ਮੀਨ ਵਿੱਚੋਂ ਸੜਕ ਲੰਘੇਗੀ? ਫਿਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਹੁਣ ਤੱਕ ਕਿਸੇ ਨੇ ਪੈਸੇ ਨਹੀਂ ਮੰਗੇ ਹਨ। ਇਸ ਦੇ ਉਲਟ, ਉਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਜੇਕਰ ਸੜਕ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਜ਼ਮੀਨ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ, ਤਾਂ ਇਹ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾਲ ਲੈਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਮੈਂ ਇਹ ਸੁਣ ਕੇ ਹੈਰਾਨ ਰਹਿ ਗਿਆ। ਕਿਉਂਕਿ ਮੇਰੇ ਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ, ਜੇਕਰ ਮੁਆਵਜ਼ੇ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਤੋਂ ਥੋੜ੍ਹੀ ਜਿਹੀ ਜ਼ਮੀਨ ਵੀ ਲੈ ਲਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਖੂਨ-ਖਰਾਬਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਬਰਮਾ ਵਿੱਚ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਕਿਉਂ? ਬ੍ਰਾਹਮੀ ਲੋਕ ਆਪਣੀ ਜਾਇਦਾਦ ਪ੍ਰਤੀ ਇੰਨੇ ਉਦਾਰ ਕਿਵੇਂ ਹਨ? ਕੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਜ਼ਮੀਨ ਦਾ ਕੋਈ ਲਾਲਚ ਨਹੀਂ ਹੈ? ਕੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਜਾਇਦਾਦ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਹੀਂ ਹੈ? ਇਸਦਾ ਕਾਰਨ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਬੁੱਧ ਦਾ ‘ਸਭ ਅਨਾਮ’ (ਸਭ ਅਸਥਾਈ ਹੈ) ਦਾ ਉਪਦੇਸ਼ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿੱਚ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸਥਾਪਿਤ ਹੈ। ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਵੀ ਸਥਾਈ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਸਦੀਵੀ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਨਾਸ਼ਵਾਨ ਹੈ, ਫਿਰ ਅਜਿਹੀਆਂ ਅਸਥਾਈ ਚੀਜ਼ਾਂ ਲਈ ਕਿਉਂ ਲੜੋ? ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਜ਼ਮੀਨ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ ਤਾਂ ਹਰ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਇਸਨੂੰ ਲਓ, ਇਹ ਉਹੀ ਸੋਚਦੇ ਹਨ।

    ਭਰਾਵੋ ਅਤੇ ਭੈਣੋ, ਮੈਨੂੰ ਤੁਹਾਨੂੰ ਹੋਰ ਕੁਝ ਦੱਸਾਂ ਅਜਿਹਾ ਕੁੱਝ ਬਚਿਆ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਮੇਰਾ ਇੱਕੋ ਇੱਕ ਉਦੇਸ਼ ਤੁਹਾਨੂੰ ਕੁਝ ਮੁੱਦਿਆਂ ਤੋਂ ਜਾਣੂ ਕਰਵਾਉਣਾ ਸੀ। ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਦੇ ਜਿੱਤ ਦੇ ਢੋਲਾਂ ਤੋਂ ਨਾ ਡਰੋ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਹੋਵੋ। ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਬੋਧੀ ਸੋਚ ਅਤੇ ਦਰਸ਼ਨ ਦਾ ਦਸਵਾਂ ਹਿੱਸਾ ਵੀ ਗ੍ਰਹਿਣ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ, ਤਾਂ ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਦਇਆ, ਨਿਆਂ ਅਤੇ ਸਦਭਾਵਨਾ ਦੀ ਤਾਕਤ ‘ਤੇ ਉਹ ਬਣਾ ਸਕੋਗੇ ਜੋ ਕਮਿਊਨਿਜ਼ਮ ਬਣਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਧੰਨਵਾਦ!

    ” ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਇਹ ਵਿਚਾਰ ਕੌਂਸਲ ਦੇ ਕਈ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀਆਂ ਨੂੰ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਦੇ ਇੱਕ ਨਵੇਂ ਦਰਸ਼ਨ ਵਾਂਗ ਜਾਪਦੇ ਸਨ। ਸੱਚ, ਦੁੱਖ, ਬੁੱਧ ਦੇ ਚਾਰ ਮਹਾਨ ਸੱਚਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ, ਮਾਰਕਸ ਦੇ ਆਰਥਿਕ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਨਾਲ ਤੁਲਨਾ ਅਤੇ ਬੁੱਧ ਧਰਮ ਨੂੰ ਇੱਕ ਪ੍ਰੇਰਨਾਦਾਇਕ ਜੀਵਤ ਸਮਾਜਿਕ ਸ਼ਕਤੀ ਵਜੋਂ ਪੇਸ਼ ਕਰਨਾ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀਕੋਣ ਹੈ। ਇਸਦਾ ਆਧਾਰ ਬੁੱਧ ਦੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਦਾ ਵੀ ਹੈ। ਕੁਝ ਬੋਧੀ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੇ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਆਪਣੀ ਪ੍ਰਤੀਕਿਰਿਆ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਇਹ ਕਿਹਾ। “”