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  • मनुष्यों के बीच प्रेम, करुणा के आधार पर संबंध जोड़ने वाले बौद्ध धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है समता

    दिनांक 25 नवंबर, 1956 के दिन शाम को सारनाथ के मूलगंध कुटी विहार के मैदान में महाबोधि सभा द्वारा डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

    शुरु में मंगलाचरण के बाद लद्दाख के लामा लोबजङ् ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को ‘खदा’ यानी वस्त्र भेंट किए। उसके बाद वाराणसी की 18 संस्थाओं ने उन्हें फूलमालाएं प्रदान कीं। सेवासंगम ट्रस्ट की ओर से डॉ. एन. एन. शर्मा ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को दो सुंदर स्वर्ण स्मृतिचिन्ह भेंट किए। डॉ. बाबासाहेब का भाषण सुनने के लिए सारनाथ के आसपास के जिलों से बड़े पैमाने पर जनसमुदाय उपस्थित था।’

    इस कार्यक्रम की खासियत यह थी कि यह सभा महाबोधि के बुद्ध विहार के प्रांगण में धम्मेक स्तूप की छाया में थी। बुद्ध ने जहां पंच वग्गीय भिक्षुओं को अपना पहला उपदेश कर धम्मचक्र प्रवर्तन किया उस जगह सम्राट अशोक ने एक स्तूप खड़ा किया था। उस स्तूप का नाम धम्मेक स्तूप है। वहीं डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का बहुजन जनता को सम्बोधित कर आखिरी भाषण हो यह अभिभूत कर देने वाला और क्रांतिकारी संयोग है।

    बाबासाहेब के बारे में बताते हुए भिक्षु धर्मरक्षित ने कहा, बौद्ध देशों में एक श्रद्धामयी धारणा प्रचलित है कि बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद ढाई हजार सालों के बाद भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान होने वाला है। मेरी श्रद्धा है कि जो बोधिसत्व यह काम पूरा करेगा वह आज हमारे बीच डॉ. बाबासाहेब के रूप में हमारे बीच उपस्थित है। इसी सारनाथ में पच्चीस शतक पूर्व पांच भिक्षुओं के सामने आज जैसे ही एक रविवार के दिन इस सामने वाले धम्मेक स्तूप की जगह भगवान ने धर्मचक्र का परिवर्तन किया।

    उसी धम्मचक्र को नागपूर में गति देकर पांच लाख लोगों के हृदय में धम्म का पवित्र संदेश पहुंचाने वाले महापुरुष का आज हम स्वागत कर रहे हैं।

    प्रशांत और पवित्र स्मृति से भरा वातावरण, चारों ओर भक्तिभाव से ओतप्रोत बैठी बहुजन जनता और लंका, तिब्बत, ब्रह्मदेश, जापान आदि देशों के कुछ लामा, भिक्षु और उपासक लोगों की उपस्थिति के कारण शायद डॉ. बाबासाहेब का मन भर आया। कंठ रुंध गया।

    सजल आंखों और रुंधे गले से दिया गया वह एक करुणामय भाषण था। बाबा का वह अंतिम संदेश साबित हुआ।

    अपने स्वागत का जवाब देते हुए डॉ. बाबासाहेब ने कहा-

    लंबी यात्रा के कारण मुझे थोड़ी थकान हो रही है। मैं यहां केवल आपसे स्वागत में मिलने वाली फूलमाला पाने के लिए आया था। लेकिन मुझसे मिलने की आपने जो उत्सुकता और आस्था प्रकट की है उसके बदले में आपसे चार शब्द कहना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। आपमें से कई लोगों को अस्पृश्य माना जाता है। भगवान बुद्ध के समय में अस्पृश्यता नहीं थी। सांस्कृति के स्तर पर कमतर जमातें उस जमाने में भी थीं लेकिन उन्हें अस्पृश्य नहीं माना जाता था। अस्पृश्यता का शाप पिछले डेढ़ हजार सालों का है और उसके लिए जिम्मेदार है हिंदू धर्म अस्पृश्यता हमारा कलंक नहीं है, वह उच्च हिंदू जाति के मस्तक का कलंक है। आज इतने साल हुए लेकिन ये कलंक धोकर हटाने की इच्छा हिंदुओं के मन में ईमानदारी से कभी पैदा नहीं हुई। हमारे रहन-सहन या हमारे काम के कारण वे हमें अस्पृश्य नहीं मानते। हमने सफाई रखी, साफ कपड़े पहने, उच्च व्यवसाय किए, मन को निश्छल और पवित्र रखा, निर्भयता से व्यवहार करने लगे तब भी ये हिंदू हमें अस्पृश्य मानते हैं। इसलिए यह हिंदू धर्म हमें छोड़ना ही होगा। भारत में जो बौद्ध धम्म पैदा हुआ और जिस धम्म ने मनुष्यों के बीच भेदभाव करने से इनकार किया, जिस धम्म का केंद्रीय सिद्धांत समता पर आधारित है उसे अब हमें स्वीकारना होगा। भगवान ने अपने धम्म की स्थापना दुनिया के दुखों का नाश करने के लिए की। अन्य धर्म भगवान और इंसान के बीच संबंध जोड़ने वाले हैं। मनुष्यों के आपसी संबंध प्रेम और करुणा के सिद्धांतों के सहारे जोड़ने वाला एक ही धम्म है – बौद्ध धम्म। बुद्ध ने अपने धर्माचरण का आदर्श संघ के रूप में दुनिया के सामने रखा। उस समाज में कोई जाति-पांति का भेदभाव नहीं । समुंदर में मिलने वाली नदी जिस प्रकार समंदर के साथ एकसार हो जाती है उसी प्रकार बुद्ध के समाज में जातियां समाप्त होकर एकरूप हो जाती हैं।

    आज डेढ़ हजार सालों से हिंदू समाज में सुधार आएगा, उसमें समता आएगी, थोड़ी अकल आएगी, इसका हम गांव की सीमा से बाहर बैठे इंतजार कर रहे हैं। लेकिन किसी के दिमाग में सुधार का खयाल नहीं आया। किसी ने हमें गांव के अंदर नहीं बुलाया. उल्टे धर्म के नाम पर हमारे साथ ज्यादा से ज्यादा अन्याय-अत्याचार होने लगे। कोई कहते हैं कि समता भारत के लिए अज्ञात थी। पिछली शताब्दी में ही यहां समता के बारे में कानाफूसी शुरू हुई है। हो सकता है धीरे-धीरे हिंदू धर्म में भी सुधार आएगा और वह समता का स्वीकार करेगा। हिंदू धर्म में सुधार आएगा यह एक भ्रम है। इतिहास गवाह है कि ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व बुद्ध ने समता का उपदेश भारत को दिया था। लेकिन इस देश ने उस उपदेश को ही दबा देने की नीचता भरा काम जानबूझ कर किया और उसके ठीक विरुद्ध विषमता आधारित और कुछ खास वर्गों के हित के लिए ही हिंदू धर्म प्रभावशाली बनाया गया। जब तक हिंदू धर्म का पालन किया जाता है तब तक इस देश से सामाजिक विषमता हटेगी नहीं। हिंदू धर्म द्वारा बौद्धिक स्तर पर भले जितने भी उदात्त सिद्धान्तों की घोषणा की जाए उनका आचार वर्ण, जात-पांत, स्पृश्यास्पृश्यता जैसी विषमता भरा ही होता है। चतुरवर्ण उसकी रीढ़ है। इसलिए हिंदू धर्म का त्याग करने के अलावा आपके सामने और कोई रास्ता नहीं है। आप बौद्ध होंगे तो बंधु मानने वाले कुछ लोग इस दुनिया में आपको मिलेंगे। आज हमारे देश में जो अन्याय हो रहा है उसके कारण हम बिलबिला रहे हैं। लेकिन हमें कहीं से सहानुभूति भरा साथ नहीं मिल रहा। क्योंकि, अन्याय करने वाले सभी हिंदू हैं और उन्हीं के कहे अनुसार यहां का राजतंत्र काम करता है। आप बौद्ध बनेंगे तो विदेशी बौद्ध आपको अपना बंधु मानेंगे। आपकी आवाज का वे जवाब दिए बगैर रहेंगे नहीं।

    मेरे जीवन का सैद्धान्तिक अथवा दार्शनिक आधार पांच मिनटों में मैं अपने जीवन का दर्शन बताना चाहता हूं। दर्शन का संदर्भ मैं सामाजिक दर्शन के रूप में ही लेता हूं। हर मनुष्य का जीवन के बारे में अपना कोई दर्शन होना जरुरी होता है। अपने सही व्यवहार के लिए मनुष्य के पास कोई कसौटी होना जरुरी है और वह कसौटी है उसका जीवन दर्शन । मैं हमेशा कहता हूं कि हर मनुष्य के पास अपना जीवन-दर्शन होना जरुरी है, क्योंकि इसी दर्शन के सहारे वह समझ सकता है कि वह सही कर रहा है या गलत। वह जब जानेगा कि वह खुद गलत है तभी उसे अपने दर्शन के सहारे अपनी उन्नति पाने की जिम्मेदारी का बोध होगा। मैंने अपने जीवन का दर्शन तय किया है। उस दर्शन के नास्तिक और आस्तिक दोनों पक्षों को आज मैं स्पष्ट करने जा रहा हूं। सांख्य दर्शन के त्रिगुणों पर आधारित और भगवद्गीता में विषद किया हुआ हिंदुओं का नास्तिक पक्ष दर्शन मुझे नापसंद है। मेरी राय में ऋषि कपिल के दर्शन का वह घोर विकृत स्वरूप है। उसी के कारण जातिव्यवस्था और श्रेणीगत विषमता की व्यवस्था हिंदुओं के सामाजिक जीवन का एक मूलभूत नियम बन गया है। आस्तिक पक्ष मेरा जीवन-दर्शन केवल तीन शब्दों में ही व्यक्त हुआ है। स्वतंत्रता, समता और भाईचारा । कोई यह न समझें कि फ्रांसीसी क्रांति से मैंने अपना जीवन-दर्शन उधार लिया है। मैं एक बार फिर यह बात साफ-साफ कह देता हूं। मेरे दर्शन की जड़ राजनीति में नहीं, धर्म में है। मेरे गुरु भगवान बुद्ध की शिक्षा से ही मैंने यह दर्शन स्वीकारा है।

    मैं आपको विनम्रता से बता दूं कि, मेरे जीवन संबंधी दर्शन में आजादी को विशेष स्थान है। लेकिन साथ ही प्रतिबंध आजादी समता के लिए मारक साबित होती है। मेरे दर्शन में समता का स्थान स्वतंत्रता से ऊंचा है। इसके बावजूद उसमें संपूर्ण समता के लिए बिल्कुल भी जगह नहीं। क्योंकि असीमित समता आजादी के अस्तित्व के लिए संकट पैदा करती है और आजादी के लिए जगह हो यह आवश्यक तो है ही।

    स्वतंत्रता और समता के अतिक्रमण से सुरक्षा पाने भर के लिए मेरे दर्शन में कायदा और कानून का स्थान तय है। हालांकि कानून का स्थान मेरे हिसाब से बहुत ही नगण्य है। क्योंकि स्वतंत्रता और समता के भंग होने की स्थिति में कानून यकीनन समर्थ भूमिका निभा सकता है इसका मुझे भरोसा नहीं है। मैं भाइचारे को सर्वोच्च स्थान देना चाहता हूं

    क्योंकि स्वतंत्रता और समता से अगर इनकार किया जाए तो भाइचारा ही रक्षक बनता है। सहभाव बंधुभाव का ही दूसरा नाम है। और बंधुभाव अथवा मानवता ही धर्म का दूसरा नाम है। कानून अथवा सहभाव का मूल्यांकन करते हुए इस फर्क का पता चलता है क्योंकि कानून धर्मातीत होने के कारण उसे कोई भी भंग कर सकता है। इसके विरुद्ध, सहभाव अथवा धर्म पवित्र होने के कारण उसका सम्मान करना हरेक का कर्तव्य माना जाता है।

    यह बिल्कुल न मानें कि मेरा दर्शन किसी आरामतलब व्यक्ति का ध्येय है। सामाजिक जीवन के त्रिगुण सिद्धान्तों को समाप्त कर हिंदु समाज में क्रांति ला सके ऐसा मेरा दर्शन क्रांतिकारी है। इसी कारण मैं इतना आक्रामक हूं और मेरे कई दुश्मन हैं। लेकिन मुझे ऐसे दुश्मन पसंद हैं। क्योंकि, मुझे पता है कि वे मेरी बातें ध्यान से सुनते हैं।

    मेरा दर्शन केवल मेरे लिए नहीं है, वह सबके लिए है। अलग शब्दों में कहूं तो मेरे दर्शन का खास उद्देश्य है। मैं लोगों की राय बदलना चाहता हूं। त्रिगुण तत्वों के अनुचरों से उसका त्याग करवाकर मेरे दर्शन को स्वीकृत करवाना चाहता हूं। यह बहुत बड़ा, महती कार्य है और हो सकता है इसमें बहुत अधिक समय लगे ।

    आज भारतीय लोगों को दो विभिन्न वाद नियंत्रित करते हैं। राज्य संविधान के उद्देश्यपत्र में सूचित किया गया उद्देश्यवाद और धर्म में अंतर्भूत सामाजिक उद्देश्यवाद । समझदार व्यक्ति जान जाएगा कि इन उद्देश्यों में परस्पर विसंगति हैं। राजनीतिक ध्येयवादिता के कारण आजादी, समता और बंधुभाव इन तीन जीवनमूल्यों को मान्यता मिली हुई है। लेकिन प्रचलित सनातनी मानसिकता वाले सामाजिक उद्देश्यवाद के कारण ये तीन तत्व व्यावहारिक जीवन में नकारे गए हैं। इस प्रकार का विसंगतिपूर्ण जीवन कब तक चलेगा? कभी न कभी एक-दूसरे की शरण जाने के अलावा कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। मेरे जीवन-दर्शन में मेरा पूरा भरोसा है और इसीलिए आज अधिकतर भारतीयों का वह राजनीतिक उद्देश्य बना है। कभी वह सबका सामाजिक उद्धेश्यवाद बनेगा ऐसी मैं उम्मीद करता हूं।